घटता उपलब्ध पुलिस बल, बढ़ता कार्यभार, जातिगत व सामाजिक आंदोलनों से लेकर भीड़तंत्र और बाहरी दबाव तक—पुलिसकर्मियों के मानसिक स्वास्थ्य के साथ व्यवस्था के मूल कारणों पर भी विचार जरूरी

(डॉ.एल.एन.वैष्णव)
भोपाल। कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालने वाली पुलिस व्यवस्था के सामने अब एक ऐसी चुनौती भी तेजी से सामने आ रही है, जिसका असर सीधे पुलिसकर्मियों के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ता है। मध्यप्रदेश पुलिस मुख्यालय द्वारा प्रदेश की सभी जिला पुलिस इकाइयों में मेंटल हेल्थ सेंटर स्थापित करने की दिशा में योजना तैयार की जा रही है। प्रस्तावित केंद्रों के माध्यम से पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों को मनोवैज्ञानिक परामर्श, तनाव प्रबंधन, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सहायता तथा आवश्यकता के अनुसार विशेषज्ञों की सेवाएं उपलब्ध कराने की योजना बताई गई है।
पुलिस वेलफेयर से जुड़े अधिकारियों के अनुसार कानून-व्यवस्था, अपराध नियंत्रण, वीआईपी सुरक्षा, त्योहार, चुनावी ड्यूटी, धरना-प्रदर्शन और लगातार बढ़ते कार्यभार के कारण पुलिसकर्मियों पर लंबे समय से मानसिक दबाव बना रहता है। कई परिस्थितियों में लंबे समय तक ड्यूटी, अवकाश की कमी और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। पिछले वर्षों में पुलिसकर्मियों से जुड़ी आत्महत्या और आत्महत्या के प्रयास की घटनाओं ने भी मानसिक स्वास्थ्य को लेकर विभागीय चिंता को बढ़ाया है।
प्रस्तावित मेंटल हेल्थ सेंटरों में प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिकों और काउंसलरों की सेवाएं उपलब्ध कराने की बात सामने आई है। जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ चिकित्सकों से ऑनलाइन तथा ऑफलाइन परामर्श की सुविधा भी दी जा सकती है। गोपनीय काउंसलिंग, मानसिक स्वास्थ्य स्क्रीनिंग और तनाव प्रबंधन सत्र इस व्यवस्था का हिस्सा हो सकते हैं।एआईजी पुलिस वेलफेयर इरमीन शाह के अनुसार प्रदेश की सभी जिला पुलिस इकाइयों में मेंटल हेल्थ सेंटर स्थापित करने की दिशा में योजना बनाई जा रही है। उद्देश्य पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों को तनावमुक्त वातावरण उपलब्ध कराना तथा उनके मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाना है।लेकिन इस पहल के साथ एक बड़ा सवाल भी सामने आता है—क्या पुलिसकर्मियों के तनाव का समाधान केवल काउंसलिंग से हो सकेगा, या इसके पीछे मौजूद कार्य-परिस्थितियों पर भी समान रूप से ध्यान देना होगा?
सवाल केवल मानसिक तनाव का नहीं, पुलिस बल की उपलब्धता का भी
किसी पुलिसकर्मी पर काम का दबाव कितना है, यह केवल उसकी व्यक्तिगत क्षमता का विषय नहीं है। इसके पीछे उपलब्ध पुलिस बल, स्वीकृत पदों और वास्तविक पदस्थापना के बीच अंतर तथा एक कर्मचारी पर आने वाली जिम्मेदारियों की संख्या भी महत्वपूर्ण होती है।केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा संसद में उपलब्ध कराए गए एक पुराने आंकड़े के अनुसार 1 जनवरी 2020 के आसपास मध्यप्रदेश में स्वीकृत पुलिस बल 1,30,984 था, जबकि वास्तविक संख्या 99,496 थी और 31,488 पदों की कमी दर्ज की गई थी। यह आंकड़ा वर्तमान स्थिति का प्रतिनिधि नहीं माना जाना चाहिए, लेकिन यह बताता है कि स्वीकृत और वास्तविक पुलिस बल के बीच अंतर लंबे समय से एक नीतिगत चुनौती रहा है।
इसके बाद के उपलब्ध आंकड़ों में भी बल की संरचना और रिक्तियों का प्रश्न दिखाई देता है। BPR&D के 1 जनवरी 2024 के आंकड़ों के अनुसार मध्यप्रदेश में जिला सिविल पुलिस की स्वीकृत संख्या 96,132 और वास्तविक संख्या 85,093 थी, जबकि राज्य सशस्त्र पुलिस की स्वीकृत संख्या 27,131 और वास्तविक संख्या 20,508 थी।
वर्ष 2026 में भी पुलिस विभाग में रिक्त पदों को भरने की प्रक्रिया आगे बढ़ाए जाने की जानकारी सामने आई है। हजारों पदों पर भर्ती की प्रक्रिया इस बात का संकेत देती है कि मानव संसाधन को मजबूत करना पुलिस व्यवस्था की प्राथमिकताओं में शामिल है।यहां मूल सवाल यह है कि यदि उपलब्ध बल आवश्यकता की तुलना में कम हो और उसी बल को अपराध नियंत्रण से लेकर कानून-व्यवस्था, यातायात, वीआईपी सुरक्षा, त्योहार, चुनाव और आंदोलन तक अनेक जिम्मेदारियां निभानी हों, तो प्रत्येक पुलिसकर्मी के कार्यभार पर उसका प्रभाव कितना पड़ता है?
पुलिसिंग का दायरा लगातार बढ़ रहा है
आज पुलिस का काम केवल अपराधी की गिरफ्तारी या प्राथमिकी दर्ज करने तक सीमित नहीं है। साइबर अपराध, महिला एवं बाल अपराध, सोशल मीडिया से पैदा होने वाली कानून-व्यवस्था की परिस्थितियां, यातायात, बड़े सार्वजनिक आयोजन, वीआईपी मूवमेंट, धार्मिक कार्यक्रम और आपात परिस्थितियां भी पुलिसिंग का हिस्सा बन चुकी हैं।
एक ओर पुलिस से अपराध नियंत्रण और त्वरित कार्रवाई की अपेक्षा होती है, दूसरी ओर हर सार्वजनिक आयोजन में सुरक्षा और कानून-व्यवस्था सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी उसी व्यवस्था पर होती है।इस बदलते स्वरूप में पुलिसकर्मी के लिए लगातार मानसिक सतर्कता बनाए रखना अपने आप में एक चुनौती बन जाता है।
जातिगत और सामाजिक आंदोलनों में पुलिस की दोहरी जिम्मेदारी
मध्यप्रदेश सहित देशभर में समय-समय पर विभिन्न सामाजिक, जातिगत, क्षेत्रीय और स्थानीय मुद्दों को लेकर आंदोलन, प्रदर्शन, धरने और रैलियां होती रही हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण प्रदर्शन और अपनी बात रखने का अधिकार महत्वपूर्ण है। लेकिन जब किसी आंदोलन में बड़ी संख्या में लोग एकत्र होते हैं, यातायात प्रभावित होता है, तनाव की स्थिति बनती है या कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका पैदा होती है, तब पुलिस की जिम्मेदारी कई गुना बढ़ जाती है।
ऐसी स्थिति में पुलिस को एक साथ प्रदर्शनकारियों के अधिकारों की रक्षा, आम नागरिकों की सुरक्षा, यातायात व्यवस्था और कानून-व्यवस्था बनाए रखने का काम करना पड़ता है।जातिगत या सामाजिक रूप से संवेदनशील विषयों से जुड़े आंदोलनों में पुलिस की भूमिका और भी चुनौतीपूर्ण हो जाती है, क्योंकि किसी भी कार्रवाई को लेकर पक्षपात के आरोप लगने की संभावना रहती है। ऐसे मामलों में पुलिस के लिए कानून का समान अनुपालन, संयम और निष्पक्षता बनाए रखना आवश्यक हो जाता है।यहां सवाल किसी विशेष जाति, संगठन या आंदोलन पर नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर है जिसमें पुलिस को अत्यंत संवेदनशील सामाजिक परिस्थितियों में कानून और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है।
भीड़तंत्र और सोशल मीडिया की नई चुनौती
सोशल मीडिया के दौर में किसी घटना, बयान, वीडियो या अफवाह के तेजी से प्रसारित होने के बाद बहुत कम समय में बड़ी संख्या में लोग एक स्थान पर एकत्र हो सकते हैं। पुलिस के सामने कई बार स्थिति पूरी तरह स्पष्ट होने से पहले ही संभावित तनाव को नियंत्रित करने की चुनौती आ जाती है।बड़ी भीड़ के सामने पुलिसकर्मी को संयम बनाए रखते हुए स्थिति पर लगातार नजर रखनी होती है। किसी छोटी घटना के बढ़कर बड़े विवाद में बदलने की आशंका के बीच निर्णय लेने का दबाव भी रहता है।
यही वह स्थिति है जिसे व्यापक अर्थ में ‘भीड़तंत्र’ की चुनौती कहा जा सकता है—जहां कानून और संस्थागत प्रक्रिया के बजाय भीड़ का दबाव किसी परिस्थिति की दिशा प्रभावित करने लगे।ऐसे माहौल में पुलिसकर्मी की ड्यूटी केवल शारीरिक रूप से कठिन नहीं होती, बल्कि लगातार मानसिक दबाव वाली भी हो सकती है।
राजनीतिक और बाहरी दबाव का सवाल
पुलिस सुधार की चर्चा में राजनीतिक अथवा कार्यपालिका संबंधी दबाव का विषय भी लंबे समय से सामने आता रहा है। इस मुद्दे को किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल पर आरोप के रूप में देखने के बजाय संस्थागत व्यवस्था के प्रश्न के रूप में समझना आवश्यक है।पुलिस सुधार संबंधी न्यायिक विमर्श में पुलिस को पेशेवर ढंग से काम करने के लिए संस्थागत स्वतंत्रता, पारदर्शिता और जवाबदेही की आवश्यकता पर चर्चा हुई है। पुलिस अधिकारियों के स्थानांतरण, तैनाती और कार्यप्रणाली पर अनुचित बाहरी प्रभाव को लेकर भी समय-समय पर सुधार की जरूरत बताई गई है।
इसका अर्थ यह नहीं कि पुलिस के प्रत्येक निर्णय पर राजनीतिक दबाव होता है। लेकिन यह प्रश्न जरूर महत्वपूर्ण है कि क्या पुलिसकर्मी को कानून के अनुरूप निर्णय लेने और उस निर्णय की जिम्मेदारी निभाने के लिए पर्याप्त संस्थागत सुरक्षा प्राप्त है?यदि किसी पुलिसकर्मी को कानून और प्रशासनिक प्रक्रिया के साथ-साथ अलग-अलग प्रकार के बाहरी दबावों को भी संभालना पड़े, तो इसका कार्यस्थल के वातावरण और मानसिक स्थिति पर क्या प्रभाव पड़ता है—यह अध्ययन का विषय हो सकता है।
मानसिक स्वास्थ्य केंद्र क्यों जरूरी?
ऐसी परिस्थितियों में मानसिक स्वास्थ्य केंद्र की आवश्यकता स्पष्ट होती है। पुलिसकर्मी भी एक इंसान है और लगातार तनावपूर्ण परिस्थितियों में काम करने के कारण उसे भी मानसिक सहायता की जरूरत पड़ सकती है।गोपनीय काउंसलिंग की व्यवस्था महत्वपूर्ण इसलिए भी है कि पुलिसकर्मी अपनी व्यक्तिगत या मानसिक समस्या को बिना किसी प्रशासनिक भय या सामाजिक संकोच के विशेषज्ञ के सामने रख सके।नियमित मानसिक स्वास्थ्य स्क्रीनिंग, तनाव प्रबंधन प्रशिक्षण, विशेषज्ञ मनोवैज्ञानिकों की उपलब्धता और गंभीर मामलों में चिकित्सकीय सहायता इस व्यवस्था को प्रभावी बना सकती है।लेकिन यहां फिर वही सवाल सामने आता है—क्या समस्या के कारणों पर काम किए बिना केवल उसके परिणाम का उपचार पर्याप्त होगा?
यदि बल कम है तो काउंसलिंग के साथ व्यवस्था भी बदले
मानसिक स्वास्थ्य केंद्र उस पुलिसकर्मी की मदद कर सकता है जो तनाव में है। लेकिन यदि तनाव पैदा करने वाली परिस्थितियां लगातार बनी रहती हैं, तो दीर्घकालीन समाधान के लिए कार्य-व्यवस्था में भी सुधार जरूरी होगा।पुलिस बल की पर्याप्त उपलब्धता, रिक्त पदों की पूर्ति, ड्यूटी के घंटे, साप्ताहिक विश्राम, अवकाश, जांच और कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारियों का बेहतर विभाजन, आधुनिक संसाधन, प्रशिक्षण और पर्याप्त विश्राम—ये सभी मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े हुए विषय हैं।एक पुलिसकर्मी को लगातार कई प्रकार की ड्यूटी में लगाया जाएगा और फिर केवल तनाव प्रबंधन की सलाह दी जाएगी, तो व्यवस्था के मूल प्रश्न अनुत्तरित रह जाएंगे।
जेलों में भी मानसिक स्वास्थ्य पर बढ़ता जोर
मानसिक स्वास्थ्य की चुनौती केवल पुलिस विभाग तक सीमित नहीं है। जेलों में बंद कैदियों के मानसिक स्वास्थ्य और पुनर्वास को लेकर भी संस्थागत प्रयास किए जा रहे हैं।आपके उपलब्ध विवरण के अनुसार भोपाल सेंट्रल जेल में Psychological Care Centre की शुरुआत की गई है। इसका उद्देश्य कैदियों की मानसिक स्थिति को समझना, काउंसलिंग उपलब्ध कराना, व्यवहार संबंधी समस्याओं पर काम करना और आवश्यकता के अनुसार उपचार तथा पुनर्वास में सहायता देना है।
राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय के निदेशक राकेश सिंह के अनुसार यह देशभर में इस प्रकार का नौवां केंद्र है। जेल प्रशासन की ओर से भी काउंसलिंग के माध्यम से तनाव कम करने और जेल से बाहर आने के बाद बेहतर पुनर्वास में सहायता मिलने की बात कही गई है।पुलिस और जेल—दोनों क्षेत्रों में मानसिक स्वास्थ्य को संस्थागत रूप से स्वीकार किया जाना इस बात का संकेत है कि कानून-व्यवस्था और सुधारात्मक प्रशासन में मानसिक स्वास्थ्य को अब अलग-थलग विषय के रूप में नहीं देखा जा सकता।
समाधान केवल काउंसलिंग नहीं, बहुस्तरीय सुधार
पुलिसकर्मियों के मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत करने के लिए एक साथ कई स्तरों पर काम करने की आवश्यकता होगी—
- जिला स्तर पर गोपनीय और आसानी से उपलब्ध मानसिक स्वास्थ्य सहायता।
- नियमित मानसिक स्वास्थ्य स्क्रीनिंग और तनाव प्रबंधन कार्यक्रम।
- आवश्यकता पड़ने पर मनोवैज्ञानिक एवं मनोचिकित्सकीय विशेषज्ञों की सहायता।
- ड्यूटी के घंटे और साप्ताहिक विश्राम की प्रभावी निगरानी।
- रिक्त पुलिस पदों की समयबद्ध पूर्ति।
- जांच और कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारियों के बेहतर पृथक्करण पर विचार।
- लगातार तनाव वाली भीड़ प्रबंधन या आंदोलन संबंधी ड्यूटी के बाद पर्याप्त विश्राम।
- पुलिसकर्मियों और उनके परिवारों के लिए सहायता तंत्र।
- स्थानांतरण एवं तैनाती में पारदर्शी संस्थागत व्यवस्था।
- कानून के अनुरूप पेशेवर निर्णय लेने के लिए पुलिस को स्पष्ट प्रशासनिक सुरक्षा।
- जातिगत, सामाजिक और राजनीतिक रूप से संवेदनशील आंदोलनों के लिए विशेष प्रशिक्षण।
- सोशल मीडिया से उत्पन्न अफवाह और भीड़ संबंधी परिस्थितियों से निपटने के लिए आधुनिक प्रशिक्षण एवं त्वरित संचार व्यवस्था।
असली सवाल—पुलिसकर्मी को संभालने वाली व्यवस्था कौन संभालेगा?
पुलिस से समाज हर परिस्थिति में संयम, तत्परता और कानून के पालन की अपेक्षा करता है। जब कोई विवाद बढ़ता है, आंदोलन होता है, भीड़ जमा होती है, त्योहार आता है, चुनाव होते हैं या कोई आपात स्थिति पैदा होती है, तब सबसे पहले पुलिस ही मैदान में दिखाई देती है।लेकिन उस पुलिसकर्मी के पीछे खड़ी व्यवस्था कितनी मजबूत है—यह सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है।यदि पुलिस बल पर्याप्त है, ड्यूटी का वैज्ञानिक वितरण होता है, पर्याप्त विश्राम मिलता है, संवेदनशील परिस्थितियों के लिए प्रशिक्षण है, निर्णय लेने में पेशेवर स्वतंत्रता है और मानसिक स्वास्थ्य सहायता उपलब्ध है, तो पुलिसकर्मी पर पड़ने वाले दबाव को कम करने की संभावनाएं बढ़ती हैं।
मध्यप्रदेश में जिला स्तर पर मेंटल हेल्थ सेंटर स्थापित करने की पहल इसलिए महत्वपूर्ण है कि इससे पहली बार नहीं तो कम से कम अधिक स्पष्ट रूप से यह स्वीकार किया जा रहा है कि पुलिसकर्मी भी मानसिक दबाव से प्रभावित हो सकते हैं और उन्हें संस्थागत सहायता की आवश्यकता है।लेकिन इस पहल की वास्तविक सफलता इस बात से तय होगी कि यह केवल काउंसलिंग सेंटर बनकर रह जाती है या पुलिस बल, कार्यभार, अवकाश, भीड़ प्रबंधन, संवेदनशील आंदोलनों, पेशेवर स्वतंत्रता और कार्यस्थल के वातावरण में व्यापक सुधार के साथ जोड़ी जाती है।
आखिर सवाल केवल यह नहीं है कि पुलिसकर्मी तनाव में क्यों है।बड़ा सवाल यह है कि तनाव पैदा करने वाली परिस्थितियां क्या हैं और क्या पुलिस व्यवस्था उन परिस्थितियों को बदलने के लिए तैयार है?क्योंकि कानून-व्यवस्था की रक्षा करने वाले पुलिसकर्मी का मानसिक स्वास्थ्य केवल विभाग का आंतरिक विषय नहीं, बल्कि निष्पक्ष पुलिसिंग, नागरिक सुरक्षा और लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून के शासन से जुड़ा सार्वजनिक मुद्दा भी है।
