इंदौर में सेवानिवृत्त न्यायिक-अधिकारी, अधिवक्ता, उद्योगपति और बुद्धिजीवियों को किया संबोधित, पंच परिवर्तन का दिया संदेश
इंदौर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर देशभर में आयोजित की जा रही प्रमुख जनगोष्ठियों की श्रृंखला के अंतर्गत शनिवार को इंदौर में दो महत्वपूर्ण बौद्धिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। इन कार्यक्रमों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य सुरेश सोनी ने संघ की सौ वर्षीय यात्रा, भारतीय समाज की मूल चेतना, राष्ट्र निर्माण की अवधारणा तथा आगामी शताब्दी के लिए निर्धारित सामाजिक लक्ष्यों पर विस्तार से प्रकाश डाला।
पहला कार्यक्रम चोईथराम स्कूल के सभागार में आयोजित हुआ, जिसमें सेवानिवृत्त न्यायिक एवं प्रशासनिक अधिकारी, वरिष्ठ अधिवक्ता तथा समाज जीवन से जुड़े बुद्धिजीवी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। वहीं दूसरा कार्यक्रम MGM Medical College के सभागार में आयोजित किया गया, जहां शहर के प्रमुख उद्योगपति, शिक्षाविद् एवं सामाजिक प्रतिनिधियों ने सहभागिता की।

भारत की सभ्यता कालजयी, क्योंकि यहां जीवन का आधार केवल भोग नहीं, पुरुषार्थ है
अपने संबोधन में श्री सुरेश सोनी ने कहा कि विश्व इतिहास इस बात का साक्षी है कि अनेक सभ्यताएं अपने उत्कर्ष के शिखर पर पहुंचने के बाद भी काल के गर्त में विलीन हो गईं, किन्तु भारत की संस्कृति और सभ्यता आज भी जीवंत, प्राणवान और मार्गदर्शक रूप में विद्यमान है। इसका मूल कारण यह है कि भारत का समाज पूर्वकाल से ही पुरुषार्थ प्रधान समाज रहा है, जिसने जीवन को केवल उपभोग या सत्ता तक सीमित नहीं रखा, बल्कि कर्तव्य, साधना, आत्मानुशासन और लोकमंगल से जोड़ा।
उन्होंने कहा कि भारतीय चिंतन में व्यक्ति का उत्थान समाज के उत्थान से जुड़ा है और समाज का उत्थान राष्ट्र की शक्ति का आधार बनता है। यही कारण है कि यहां की सभ्यता में ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का भाव निहित है।
डॉ. हेडगेवार के मन में उठता था प्रश्न—इतना समृद्ध राष्ट्र बार-बार परतंत्र क्यों हुआ?
श्री सोनी ने संघ स्थापना की पृष्ठभूमि बताते हुए कहा कि स्वाधीनता आंदोलन के दौरान डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के मन में यह प्रश्न लगातार उठता था कि जिस राष्ट्र के पास गौरवशाली इतिहास, सांस्कृतिक समृद्धि, ज्ञान-विज्ञान, आध्यात्मिकता, सामाजिक संरचना और मानवता के श्रेष्ठ मूल्य हैं, वह बार-बार विदेशी आक्रमणों का शिकार होकर परतंत्र क्यों होता रहा?
इस प्रश्न के उत्तर की खोज में डॉक्टर हेडगेवार ने व्यापक सामाजिक अध्ययन किया और पाया कि समाज के भीतर संगठनबद्ध जीवन का भाव क्षीण हो चुका था। जाति, भाषा, क्षेत्र, वर्ग और व्यक्तिगत स्वार्थों ने समाज की सामूहिक चेतना को दुर्बल कर दिया था। इसी कारण राष्ट्र के पास सामर्थ्य होते हुए भी वह संगठित प्रतिरोध नहीं कर सका।उन्होंने कहा कि इस समस्या के समाधान के रूप में डॉक्टर हेडगेवार ने व्यक्ति निर्माण और समाज संगठन—इन दो आधारों पर कार्य प्रारंभ किया, जो आगे चलकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना का कारण बना।
संघ का उद्देश्य केवल संगठन नहीं, राष्ट्रभावना का पुनर्जागरण
श्री सोनी ने कहा कि संघ की स्थापना किसी राजनीतिक महत्वाकांक्षा से नहीं, बल्कि समाज में लुप्त होती निस्वार्थ राष्ट्रभावना को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से हुई। भारत को ऐसे अखिल भारतीय विचार संगठन की आवश्यकता थी जो व्यक्ति को उसके स्वत्व, स्वाभिमान और सांस्कृतिक गौरव का बोध करा सके।उन्होंने कहा कि संघ ने बीते सौ वर्षों में निरंतर व्यक्ति निर्माण, सेवा, शिक्षा, ग्राम विकास, समरसता, परिवार जागरण, सामाजिक समन्वय, राष्ट्र चेतना और सांस्कृतिक पुनरुत्थान के अनेक आयामों पर कार्य किया है। यह यात्रा किसी संस्था की नहीं, बल्कि भारत के हिन्दू जीवन दृष्टिकोण के पुनर्प्रतिष्ठापन की यात्रा है।
समाज की समस्या का समाधान समाज को ही करना होगा
MGM Medical College सभागार में शहर के प्रमुख उद्योगपतियों को संबोधित करते हुए श्री सोनी ने स्पष्ट कहा कि समाज के सामने जो भी चुनौतियां हैं—चाहे वह सामाजिक विघटन हो, परिवारों का टूटना हो, संस्कारों का क्षरण हो, पर्यावरण संकट हो, आर्थिक असंतुलन हो या नागरिक दायित्वों की उपेक्षा—इन सबका समाधान केवल शासन या प्रशासन से अपेक्षित नहीं किया जा सकता। समाज की समस्याओं का समाधान समाज को ही आगे बढ़कर करना होगा।
उन्होंने कहा कि संघ का शताब्दी वर्ष केवल उत्सव नहीं, बल्कि समाज जागरण का व्यापक अभियान है, जिसके माध्यम से प्रत्येक नागरिक को राष्ट्रहित, समाजहित और विश्वकल्याण की दिशा में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
पंच परिवर्तन के माध्यम से अगले भारत का निर्माण
श्री सुरेश सोनी ने संघ द्वारा शताब्दी वर्ष में निर्धारित ‘पंच परिवर्तन’ के विषयों की जानकारी देते हुए कहा कि आने वाले भारत का निर्माण केवल आर्थिक विकास से नहीं होगा, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना के पुनर्संस्कार से होगा।
उन्होंने बताया कि पंच परिवर्तन के अंतर्गत—
- सामाजिक समरसता का विस्तार,
- कुटुंब प्रबोधन एवं पारिवारिक संस्कार,
- पर्यावरण के प्रति उत्तरदायित्व,
- स्वदेशी जीवनशैली, भाषा एवं संस्कृति का संरक्षण,
- नागरिक कर्तव्यों के प्रति सजगता
इन विषयों पर समाजव्यापी कार्य किया जाएगा। उन्होंने कहा कि भारतीय समाज में श्रम का सदैव सम्मान रहा है। यहां प्रकृति को उपभोग की वस्तु नहीं, पूज्य सृष्टि के रूप में देखा गया है। आधुनिकता के साथ आगे बढ़ना आवश्यक है, लेकिन अपनी जड़ों से कटकर नहीं। स्वदेशी जीवन शैली, मातृभाषा, सांस्कृतिक व्यवहार और राष्ट्रीय चरित्र को बनाए रखना उतना ही जरूरी है।
राष्ट्र निर्माण में प्रत्येक नागरिक की भूमिका महत्वपूर्ण
अपने उद्बोधन के अंत में श्री सोनी ने समाज के प्रत्येक वर्ग से आह्वान किया कि वे अपनी रुचि, क्षमता और प्रकृति के अनुरूप राष्ट्र निर्माण के कार्यों में निस्वार्थ भाव से जुड़ें। उन्होंने कहा कि परिवर्तन केवल भाषणों से नहीं आता, बल्कि जब समाज स्वयं अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करता है तब इतिहास बदलता है।उन्होंने कहा कि संघ की शताब्दी यात्रा का वास्तविक संदेश यही है कि भारत फिर से विश्व को दिशा देने की क्षमता रखता है, बशर्ते समाज अपने स्वत्व को पहचाने, संगठित हो और सकारात्मक परिवर्तन का वाहक बने।
