
(डॉ. एल. एन. वैष्णव)
वर्तमान समय में जिस तीव्रता से “भीड़तंत्र” (Mobocracy) का प्रभाव बढ़ रहा है, वह न केवल लोकतंत्र की आत्मा को आहत कर रहा है, बल्कि न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता और विश्वसनीयता को भी गंभीर चुनौती दे रहा है। लोकतंत्र की मूल भावना यह है कि प्रत्येक नागरिक को न्याय, अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कानून के दायरे में रहकर प्राप्त हो, किंतु आज अनेक मामलों में यह देखने को मिल रहा है कि भीड़ के दबाव में निर्णय लेने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है।
आज स्थिति यह है कि किसी भी घटना या विवाद के सामने आते ही तथ्यों की गहराई में जाने के बजाय, कुछ लोग अपनी राजनीति चमकाने के उद्देश्य से भीड़ को संगठित कर लेते हैं। धरना-प्रदर्शन, चक्का जाम, प्रशासनिक कार्यालयों का घेराव और प्रतिबंधित क्षेत्रों—जैसे कलेक्टर परिसर—में प्रवेश कर उग्र प्रदर्शन करना अब आम बात होती जा रही है। यह न केवल कानून व्यवस्था के लिए चुनौती है, बल्कि यह सीधे-सीधे लोकतंत्र और न्याय तंत्र को ठेंगा दिखाने जैसा है।
विशेषज्ञों और सामाजिक विश्लेषकों का मानना है कि इस प्रवृत्ति के पीछे कई कारण हैं। पहला कारण है त्वरित न्याय की मानसिकता—लोग अब अदालतों और जांच प्रक्रियाओं के लंबा खिंचने से अधीर हो जाते हैं और तत्काल परिणाम चाहते हैं। दूसरा कारण है राजनीतिक स्वार्थ—कुछ तथाकथित नेता किसी भी मुद्दे को अपने लाभ के लिए इस्तेमाल करते हैं। वे पीड़ित व्यक्ति को उकसाकर, उसे भावनात्मक रूप से विचलित कर भीड़ के माध्यम से दबाव बनाने की रणनीति अपनाते हैं।
सूत्रों के अनुसार, अनेक मामलों में वास्तविक घटना कुछ और होती है, लेकिन उसे तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया जाता है और फिर कार्रवाई भी उसी भ्रमित दिशा में होने लगती है। सोशल मीडिया इस प्रवृत्ति को और अधिक खतरनाक बना रहा है। बिना सत्यापन के जानकारी वायरल की जाती है, जिससे समाज में भ्रम, आक्रोश और विभाजन की स्थिति उत्पन्न होती है। जाति, वर्ग या धर्म विशेष के नाम पर भावनाओं को भड़काना और लोगों को उकसाना अब एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा बनता जा रहा है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जिन पीड़ितों के नाम पर यह आंदोलन खड़े किए जाते हैं, वही व्यक्ति अंततः मानसिक दबाव और भ्रम का शिकार हो जाते हैं। तथाकथित नेता और कुछ गैर-जिम्मेदार तत्व उन्हें इस कदर प्रभावित कर देते हैं कि वे वास्तविकता और उकसावे के बीच अंतर नहीं कर पाते। कई मामलों में यह मानसिक स्थिति आत्मग्लानि में बदल जाती है और दुर्भाग्यवश आत्महत्या जैसी घटनाएं भी सामने आती हैं। यह एक गंभीर सामाजिक और मनोवैज्ञानिक संकट का संकेत है।
कानून व्यवस्था की दृष्टि से भी स्थिति अत्यंत चिंताजनक होती जा रही है। कई बार प्रदर्शनकारी पुलिस की बैरिकेडिंग तोड़कर आगे बढ़ते हैं, पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों पर हमले करते हैं और खुलेआम प्रशासन को चुनौती देते हैं। ऐसे में पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी भी कई बार असहाय और मूक दर्शक की भूमिका में नजर आते हैं। प्रदर्शन के दौरान असंसदीय भाषा का प्रयोग, धमकी और दबाव की राजनीति लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए घातक सिद्ध हो रही है।
सोशल मीडिया और “लाइव” प्रसारण की प्रवृत्ति ने इस समस्या को और जटिल बना दिया है। कुछ लोग केवल लोकप्रियता और लाइक्स के लिए घटनाओं को सनसनीखेज बनाकर प्रस्तुत करते हैं। स्वयं को पत्रकार बताने वाले कुछ लोग बिना किसी प्रशिक्षण या नैतिक जिम्मेदारी के खबरें प्रसारित करते हैं, जिससे स्थिति और अधिक भड़काऊ हो जाती है। यह प्रवृत्ति लोकतंत्र के चौथे स्तंभ—मीडिया—की साख को भी प्रभावित कर रही है।
आज यह स्थिति बन गई है कि कुछ लोग स्वयं को ही न्यायाधीश मानने लगे हैं। वे बिना किसी प्रमाण या जांच के निष्कर्ष निकालते हैं और सभी संवैधानिक संस्थाओं—जैसे पुलिस, प्रशासन और न्यायपालिका—पर प्रश्नचिह्न खड़े करते हैं। “खाता न बही, जो हम कहें वही सही” जैसी मानसिकता समाज में अराजकता को जन्म दे रही है।
लोकतंत्र के चारों स्तंभ—विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया—इस समय इस चुनौती का सामना कर रहे हैं। यदि समय रहते इस दिशा में ठोस और प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में स्थिति और अधिक विकट हो सकती है। कानून का राज तभी कायम रह सकता है, जब नागरिकों का विश्वास संस्थाओं पर बना रहे और वे भीड़ के बजाय न्यायिक प्रक्रिया पर भरोसा करें।
इस समस्या के समाधान के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। प्रशासन को सख्ती से कानून का पालन सुनिश्चित करना होगा, विशेषकर प्रतिबंधित क्षेत्रों में अवैध प्रदर्शन पर नियंत्रण आवश्यक है। सोशल मीडिया पर निगरानी और गलत जानकारी फैलाने वालों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई जरूरी है। साथ ही, आम नागरिकों को भी जागरूक होना होगा कि वे किसी भी उकसावे या अफवाह का हिस्सा न बनें।
अंततः, यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि लोकतंत्र केवल अधिकारों का नहीं, बल्कि कर्तव्यों का भी तंत्र है। भीड़तंत्र के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए समाज, सरकार और प्रत्येक नागरिक को मिलकर जिम्मेदारी निभानी होगी। विवेक, संयम और कानून के प्रति सम्मान ही वह मार्ग है, जो हमें एक सशक्त और संतुलित लोकतंत्र की ओर ले जा सकता है।
यदि समय रहते इस बढ़ती प्रवृत्ति पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो यह केवल व्यवस्था ही नहीं, बल्कि समाज की मूल संरचना के लिए भी गंभीर खतरा बन सकती है। इसलिए आज आवश्यकता है सजगता की, जिम्मेदारी की और लोकतांत्रिक मूल्यों के संरक्षण की।
