37वें ज्ञान सम्मान समारोह में मेधावी विद्यार्थियों को रजत पदक से किया सम्मानित, शिक्षा के साथ संस्कार और अनुशासन को बताया जरूरी

(डॉ.एल.एन.वैष्णव)
दमोह। “भारत में प्रेरणा के स्रोत चारों ओर बिखरे पड़े हैं। आज दुनिया भारतीय ज्ञान, संस्कृति, योग, संस्कार और जीवन मूल्यों को समझने के लिए भारत की ओर देख रही है। हमें अपनी शिक्षा के साथ अपनी संस्कृति और संस्कारों से भी जुड़े रहना होगा।”यह बात 37वें ज्ञान सम्मान समारोह की मुख्य अतिथि डॉ. मोनिका शर्मा, निदेशक, स्वामी विवेकानंद सांस्कृतिक केंद्र, हनोई-वियतनाम, भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR) ने शुक्रवार 2 अक्टूबर को शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, दमोह के सभागार में आयोजित समारोह को संबोधित करते हुए कही। उन्होंने कहा कि विदेशों में भारतीय ज्ञान और संस्कृति को लेकर लोगों में जिज्ञासा लगातार बढ़ रही है। भारतीयों को विभिन्न विधाओं में पारंगत तथा कठिन से कठिन परिस्थितियों में समस्याओं का समाधान खोजने में सक्षम माना जाता है।स्व. ज्ञानचंद श्रीवास्तव स्मृति पुरस्कार न्यास, दमोह द्वारा शताब्दी वर्ष 2026 के अवसर पर आयोजित इस समारोह में शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले मेधावी विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों को रजत पदक एवं प्रशस्ति पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया। वहीं शिक्षा जगत में उल्लेखनीय योगदान देने वाले सेवानिवृत्त प्राध्यापकों का भी सम्मान किया गया।
स्व. ज्ञानचंद श्रीवास्तव से अपने संबंध का किया उल्लेख
मुख्य अतिथि डॉ. मोनिका शर्मा ने अपने संबोधन की शुरुआत स्व. ज्ञानचंद श्रीवास्तव और उनके परिवार से अपने संबंध का उल्लेख करते हुए की। उन्होंने कहा कि उनका स्व. ज्ञानचंद श्रीवास्तव के परिवार से किसी न किसी रूप में नाता रहा है और यही कारण है कि उनकी स्मृति में दमोह की धरती पर आयोजित इस कार्यक्रम में सहभागिता करना उनके लिए विशेष सौभाग्य की बात है।उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति का जीवन समाप्त हो सकता है, लेकिन उसके द्वारा अर्जित ज्ञान, विचार और समाज के लिए किए गए कार्य लंबे समय तक लोगों को प्रेरित करते हैं। स्व. ज्ञानचंद श्रीवास्तव की स्मृति में निरंतर आयोजित हो रहा ज्ञान सम्मान समारोह इसी परंपरा को आगे बढ़ाने का माध्यम है।
डॉ. शर्मा ने कहा कि ज्ञान कालांतर तक लोगों को प्रेरित करता रहता है। उन्होंने शिक्षा, ज्ञान और संस्कार के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि शिक्षा व्यक्ति को आगे बढ़ने का अवसर देती है, ज्ञान उसे परिस्थितियों को समझने की दृष्टि देता है और संस्कार उसके व्यक्तित्व तथा व्यवहार को दिशा देते हैं। इसलिए बच्चों और युवाओं के विकास में इन तीनों का समान महत्व है।
अष्टांग योग से व्यक्तित्व विकास की बात
डॉ. मोनिका शर्मा ने महर्षि पतंजलि द्वारा प्रतिपादित अष्टांग योग का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि बच्चों को बचपन से ही योग, अनुशासन और संस्कार की शिक्षा दी जाए तो उनके व्यक्तित्व का बेहतर विकास किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि योग को केवल शारीरिक गतिविधि के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसमें जीवन को अनुशासित और संतुलित बनाने के अनेक आयाम हैं।उन्होंने कहा कि आज बच्चों के सामने अनेक प्रकार की चुनौतियां हैं। ऐसे समय में उन्हें बचपन से ही मानसिक दृढ़ता, अनुशासन, आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच की शिक्षा देना आवश्यक है। संस्कारयुक्त शिक्षा बच्चों को परिस्थितियों का सामना करने के लिए तैयार कर सकती है।
नौसेना में जाने का था सपना
अपने जीवन से जुड़ा अनुभव साझा करते हुए डॉ. शर्मा ने कहा कि उनका सपना नौसेना में जाने का था। उनके पिता नौसेना में थे और वह स्वयं भी नौसेना में जाना चाहती थीं, लेकिन उस समय महिलाओं के लिए नौसेना में जाने के अवसर उपलब्ध नहीं थे।उन्होंने कहा कि उनके पिता से उन्हें अध्ययन के साथ संस्कार और अनुशासन की शिक्षा मिली। यही संस्कार और अनुशासन आगे चलकर उनके जीवन में महत्वपूर्ण आधार बने। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि परिवार से मिले संस्कारों को कभी छोटा नहीं समझना चाहिए, क्योंकि यही संस्कार कठिन परिस्थितियों में व्यक्ति का मार्गदर्शन करते हैं।
हिंदी पढ़ने के निर्णय पर उठे थे सवाल
डॉ. मोनिका शर्मा ने अपने हिंदी विषय चुनने के निर्णय का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने हिंदी विषय को अध्ययन के लिए चुना था, तब लोगों ने उनसे कहा था कि हिंदी पढ़कर वह क्या करेंगी। लेकिन समय के साथ परिस्थितियां बदलीं और आज वही लोग उनके निर्णय को सही बताते हैं।उन्होंने कहा कि हिंदी केवल संवाद की भाषा नहीं है, बल्कि भारत के साहित्य, संस्कृति, विचार और सामाजिक जीवन को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। उन्होंने विद्यार्थियों से भारतीय भाषाओं और विशेष रूप से हिंदी के प्रति सम्मान बनाए रखने का आह्वान किया।
दिनकर की पंक्तियों से दिया परिश्रम का संदेश
मुख्य अतिथि ने अपने संबोधन में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की पंक्तियों का उल्लेख करते हुए कठिन परिश्रम और कर्म के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को दिनभर कठिन परिश्रम करना चाहिए और इसके बाद परिणाम की चिंता किए बिना अपने कर्म के प्रति संतुष्ट रहना चाहिए।उन्होंने दिनकर की पंक्तियों के भाव का उल्लेख करते हुए कहा कि व्यक्ति के सामने चाहे कांटों की सेज हो या फूलों की, यदि उसने पूरे दिन ईमानदारी और मेहनत से काम किया है तो रात में उसे भरपूर और अच्छी नींद आती है।उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि जीवन में सफलता पाने के लिए निरंतर प्रयास करना आवश्यक है। असफलता आने पर रुकने के बजाय उससे सीख लेकर आगे बढ़ना चाहिए।
विश्व में बढ़ रही भारतीय प्रतिभाओं की स्वीकार्यता
डॉ. शर्मा ने कहा कि वर्तमान समय में भारतीय प्रतिभाओं की विश्व स्तर पर स्वीकार्यता बढ़ रही है। विभिन्न क्षेत्रों में भारतीय मूल के लोग महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल रहे हैं। उन्होंने कहा कि विदेशी नागरिकों की भारतीय प्रतिभाओं से अपेक्षाएं बढ़ी हैं।उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि वे वैश्विक स्तर पर उपलब्ध अवसरों के लिए स्वयं को तैयार करें, लेकिन इस दौरान अपनी भारतीय पहचान, संस्कृति और संस्कारों को न भूलें। आधुनिक शिक्षा और वैश्विक दृष्टिकोण के साथ अपनी जड़ों से जुड़े रहना आवश्यक है।
भारत में बार-बार जन्म लेने की इच्छा
डॉ. मोनिका शर्मा ने अपने संबोधन में भावनात्मक बात कहते हुए कहा कि वह चाहती हैं कि मृत्यु के बाद उन्हें मोक्ष प्राप्त न हो, बल्कि उन्हें बार-बार भारत में जन्म लेने का अवसर मिले, ताकि वह बार-बार भारत माता की सेवा कर सकें।उनके इस कथन ने समारोह में उपस्थित लोगों का ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि देश की सेवा केवल किसी एक क्षेत्र में रहकर ही नहीं की जाती, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति अपने कार्य, ज्ञान और आचरण के माध्यम से समाज एवं देश के लिए योगदान दे सकता है।
मेधावी विद्यार्थियों को मिले रजत पदक
समारोह में विभिन्न शैक्षणिक स्तरों पर उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों को मुख्य अतिथि डॉ. मोनिका शर्मा द्वारा रजत पदक एवं प्रशस्ति पत्र प्रदान किए गए।हायर सेकेंडरी स्तर पर कु. प्रगति असाटी को गणित विषय में 500 में से 485 अंक अर्थात 97 प्रतिशत अंक प्राप्त करने पर सम्मानित किया गया। वे असाटी वार्ड, दमोह निवासी सुदामा असाटी की पुत्री हैं।स्नातक स्तर पर कु. सुहारी राठौर को बीएससी में 75.32 प्रतिशत उपलब्धि के लिए रजत पदक एवं प्रशस्ति पत्र प्रदान किया गया। वे बजरिया वार्ड निवासी राजेश राठौर की पुत्री हैं।स्नातकोत्तर स्तर पर कु. अनि जैन को एमकॉम में 81.24 प्रतिशत अंक प्राप्त करने पर सम्मानित किया गया। वे आशीर्वाद गार्डन के सामने, दमोह निवासी प्रमोद कुमार जैन की पुत्री हैं।
स्नातक स्तर पर कु. निदा फातिमा को इतिहास विषय में 67.37 प्रतिशत उपलब्धि के लिए सम्मानित किया गया। वे फुटेरा वार्ड क्रमांक 5 निवासी नसीर खान की पुत्री हैं।पीएचडी स्तर पर डॉ. आर.पी. कुर्मी को ज्योतिष विज्ञान से संबंधित शोध कार्य के लिए सम्मानित किया गया। डॉ. रमेश कुमार व्यास को शिक्षण विधियों के तुलनात्मक अध्ययन से संबंधित शोध कार्य के लिए सम्मान प्रदान किया गया। विधि संकाय में राहुल तिवारी को एलएलबी में 3600 में से 2620 अंक अर्थात 72.77 प्रतिशत उपलब्धि के लिए रजत पदक एवं प्रशस्ति पत्र प्रदान किया गया।
सेवानिवृत्त प्राध्यापकों का भी सम्मान
समारोह में शिक्षा के क्षेत्र में सेवाएं देने वाले सेवानिवृत्त प्राध्यापकों का भी सम्मान किया गया। इनमें डॉ. श्रीमती कमल चौरसिया, डॉ. नारायण प्रसाद नायक, डॉ. श्रीमती सविता जैन, डॉ. पवन कुमार जैन, डॉ. श्रीमती रेखा जैन एवं प्रो. अनिल कुमार जैन शामिल रहे। इनके साथ स्वप्निल शर्मा का भी सम्मान किया गया।इन सभी का सम्मान न्यासी डॉ. आलोक सोनवलकर द्वारा किया गया। इस अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि शिक्षकों का योगदान केवल कक्षा तक सीमित नहीं होता, बल्कि उनके मार्गदर्शन से अनेक पीढ़ियां तैयार होती हैं।
दीप प्रज्ज्वलन से शुरू हुआ समारोह
कार्यक्रम की शुरुआत अतिथियों के स्वागत, दीप प्रज्ज्वलन एवं चित्रों पर माल्यार्पण के साथ हुई। प्राची वर्मा ने प्रज्ञा गीत प्रस्तुत किया। मुख्य अतिथि के मानपत्र का वाचन न्यासी विवेक शेणडे एवं अनुनय श्रीवास्तव ने किया। इसके बाद न्यास की ओर से डॉ. मोनिका शर्मा को मानपत्र, स्मृति चिह्न, शॉल एवं श्रीफल भेंट कर सम्मानित किया गया।
डॉ. केदारनाथ शिवहरे ने भी रखे विचार
कार्यक्रम को डॉ. केदारनाथ शिवहरे ने भी संबोधित किया। उन्होंने ज्ञान सम्मान समारोह की परंपरा और इसके उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रतिभाओं का सम्मान समाज में सकारात्मक वातावरण बनाने का कार्य करता है। उन्होंने विद्यार्थियों को अपनी उपलब्धियों को आगे की जिम्मेदारियों से जोड़ने की बात कही।
उन्होंने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों को सार्वजनिक रूप से सम्मानित किए जाने से अन्य विद्यार्थियों को भी आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है।
राजीव अयाची ने किया संचालन
कार्यक्रम का सफल संचालन न्यासी राजीव अयाची ने किया। उन्होंने समारोह के विभिन्न चरणों को क्रमबद्ध रूप से आगे बढ़ाया। कार्यक्रम के अंत में न्यास के सचिव अधिवक्ता पंकज हर्ष श्रीवास्तव ने अतिथियों, सम्मानित प्रतिभाओं, अभिभावकों, शिक्षाविदों एवं उपस्थित नागरिकों के प्रति आभार व्यक्त किया।
राष्ट्रगान के साथ समारोह का समापन हुआ।
स्व. ज्ञानचंद श्रीवास्तव स्मृति पुरस्कार न्यास द्वारा आयोजित 37वां ज्ञान सम्मान समारोह शिक्षा, प्रतिभा, ज्ञान, संस्कृति और संस्कार को समर्पित रहा। समारोह में जहां मेधावी विद्यार्थियों और शोधार्थियों को रजत पदक देकर सम्मानित किया गया, वहीं सेवानिवृत्त प्राध्यापकों के योगदान को भी स्मरण किया गया। मुख्य अतिथि डॉ. मोनिका शर्मा के संबोधन में भारतीय ज्ञान परंपरा, हिंदी भाषा, योग, संस्कार, अनुशासन और विश्व स्तर पर भारतीय प्रतिभाओं की भूमिका जैसे विषय प्रमुखता से सामने आए।
