100 करोड़ के विकास पर अतिक्रमण की दीवार, प्रशासन की नरमी या राजनीतिक दबाव?

(डॉ. एल.एन.वैष्णव)
दमोह। धार्मिक पर्यटन के मानचित्र पर बांदकपुर जागेश्वरनाथ धाम को नई पहचान दिलाने के लिए 100 करोड़ रुपये की महत्वाकांक्षी कॉरिडोर परियोजना शुरू हो चुकी है। 61 एकड़ क्षेत्र में पांच चरणों में विकसित होने वाली इस परियोजना को दमोह जिले के विकास का नया अध्याय माना जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि जब सरकार, पर्यटन विभाग और मंदिर ट्रस्ट विकास के लिए प्रयासरत हैं, तब आखिर कौन है जो इस परियोजना के रास्ते में दीवार बनकर खड़ा है?
बांदकपुर में इन दिनों विकास बनाम अतिक्रमण की जंग खुलकर सामने आ गई है। मंदिर परिसर से लगी शासकीय भूमि पर वर्षों से कब्जा जमाए बैठे लोगों के खिलाफ कार्रवाई की चर्चा तेज है, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर अब तक निर्णायक कदम नहीं उठाए जाने से कई सवाल खड़े हो रहे हैं।
मुख्य द्वार पर अतिक्रमण, आधा छिप गया आस्था का प्रवेशद्वार

बांदकपुर पहुंचने वाले श्रद्धालुओं का सबसे पहले सामना मंदिर के ऐतिहासिक मुख्य द्वार से होता है। लेकिन आज स्थिति यह है कि मुख्य द्वार के सामने खड़े निर्माणों और व्यावसायिक गतिविधियों ने उसकी भव्यता को प्रभावित कर दिया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि कॉरिडोर की मूल अवधारणा को जमीन पर उतारना है तो मुख्य द्वार के आसपास का क्षेत्र अतिक्रमण मुक्त होना अनिवार्य है।परियोजना के प्रारूप में मंदिर के चारों ओर लगभग 100 मीटर क्षेत्र को विकास के लिए महत्वपूर्ण माना गया है, लेकिन इसी क्षेत्र में सबसे अधिक विवादित कब्जे मौजूद बताए जा रहे हैं।
नोटिस जारी, लेकिन कार्रवाई कब?
मंदिर ट्रस्ट कमेटी के सचिव पंकज हर्ष श्रीवास्तव के अनुसार मंदिर की भूमि पर कब्जा जमाए लोगों को नोटिस जारी किए जा रहे हैं। पेट्रोल पंप, धर्मशाला परिसर और अन्य स्थानों पर काबिज लोगों को भूमि खाली करने के निर्देश दिए गए हैं।सवाल यह है कि यदि भूमि वास्तव में शासकीय अभिलेखों में दर्ज है और विकास कार्यों के लिए आवश्यक है, तो फिर नोटिसों के बाद भी कार्रवाई आगे क्यों नहीं बढ़ पा रही?
राजस्व रिकॉर्ड कुछ और कहते हैं
राजस्व विभाग के रिकॉर्ड बताते हैं कि खसरा नंबर 180/1/2 सहित संबंधित भूमि मध्यप्रदेश शासन के नाम दर्ज है। वर्ष 2020 में भी अतिक्रमण हटाने के लिए सैकड़ों लोगों को नोटिस जारी किए गए थे। इसके बावजूद स्थिति जस की तस बनी हुई है।यदि भूमि सरकारी है तो फिर वर्षों से कब्जे कैसे कायम हैं? और यदि कब्जे वैध हैं तो फिर राजस्व रिकॉर्ड में उनका उल्लेख क्यों नहीं है? यही वे प्रश्न हैं जिनका उत्तर स्थानीय लोग जानना चाहते हैं।
पट्टों की मांग या विकास रोकने की रणनीति?
हाल ही में पट्टों की मांग को लेकर कुछ ग्रामीण कलेक्टर कार्यालय पहुंचे। लेकिन इस घटनाक्रम ने नए सवाल खड़े कर दिए हैं। विकास समर्थकों का आरोप है कि कॉरिडोर क्षेत्र में भविष्य की कार्रवाई से बचने के लिए पट्टा आंदोलन की आड़ ली जा रही है।हालांकि पट्टों की मांग करने वाले लोगों का कहना है कि वे वर्षों से वहां निवास कर रहे हैं और अपने अधिकारों की मांग कर रहे हैं। ऐसे में प्रशासन के सामने चुनौती यह है कि वास्तविक पात्रों और प्रभावशाली कब्जाधारियों के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित किया जाए।
जर्जर धर्मशाला भी बनी चिंता
करीब सात दशक पुरानी धर्मशाला की हालत खस्ताहाल बताई जा रही है। बारिश के मौसम में इसके किसी भी समय दुर्घटनाग्रस्त होने की आशंका व्यक्त की जा रही है। पुलिस विभाग पहले ही वहां से अपनी चौकी स्थानांतरित कर चुका है, लेकिन कई किरायेदार अब भी परिसर में बने हुए हैं।मंदिर ट्रस्ट का मानना है कि इस भवन को हटाकर कॉरिडोर विकास के लिए आवश्यक स्थान उपलब्ध कराया जा सकता है।
उज्जैन और काशी मॉडल की चर्चा क्यों?

स्थानीय लोगों के बीच सबसे अधिक चर्चा इस बात की है कि जब उज्जैन महाकाल लोक और काशी विश्वनाथ कॉरिडोर जैसे बड़े धार्मिक विकास कार्यों के लिए प्रशासन ने कड़े फैसले लिए, तो बांदकपुर में वैसी प्रशासनिक इच्छाशक्ति क्यों दिखाई नहीं दे रही?लोगों का कहना है कि यदि विकास को प्राथमिकता दी जानी है तो प्रशासन को राजनीतिक और सामाजिक दबावों से ऊपर उठकर निर्णय लेने होंगे।
जमीन नहीं तो विकास भी नहीं
पर्यटन विभाग के कार्यपालन यंत्री वी. ठाकुर स्पष्ट कह चुके हैं कि कॉरिडोर विकास जमीन उपलब्धता पर निर्भर करेगा। यानी भूमि विवाद और अतिक्रमण की समस्या का समाधान नहीं हुआ तो 100 करोड़ की महत्वाकांक्षी परियोजना अधूरी भी रह सकती है।अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बांदकपुर का विकास अतिक्रमण और प्रशासनिक ढिलाई की भेंट चढ़ जाएगा, या फिर जिला प्रशासन वह दृढ़ निर्णय लेगा जिसकी प्रतीक्षा वर्षों से श्रद्धालु और क्षेत्रवासी कर रहे हैं?बांदकपुर के भविष्य का फैसला अब फाइलों में नहीं, बल्कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति और जमीनी कार्रवाई में छिपा हुआ है।
