अवैध कनेक्शन, बिगड़ती सप्लाई और जवाबदेही पर उठते सवाल
(डॉ.एल.एन.वैष्णव)
दमोह। मध्यप्रदेश का दमोह जिला इन दिनों भीषण गर्मी के साथ गंभीर पेयजल संकट का सामना कर रहा है। गांवों में खराब हैंडपंप, सूखते जल स्रोत और पानी के लिए संघर्ष कर रहे ग्रामीणों की तस्वीरें सामने आ रही हैं, वहीं दमोह नगर में भी हालात चिंताजनक दिखाई दे रहे हैं। शहर के कई हिस्सों में लोगों को 2 से 3 दिन के अंतराल में पानी मिलने की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सरकारें करोड़ों रुपये की पेयजल योजनाएं चला रही हैं, जलापूर्ति सुधारने के दावे किए जा रहे हैं, पाइपलाइन नेटवर्क विस्तार पर लगातार धन खर्च हो रहा है, तब आखिर नागरिकों को नियमित पानी क्यों नहीं मिल पा रहा?
दमोह नगर की जल व्यवस्था अब आम नागरिकों के बीच बड़ा मुद्दा बनती जा रही है। शहर में लगातार बढ़ती आबादी, जल वितरण पर बढ़ता दबाव और कथित अवैध नल कनेक्शन व्यवस्था की क्षमता को चुनौती दे रहे हैं।
स्थानीय स्तर पर उठ रही चिंताओं के अनुसार नगर क्षेत्र में बड़ी संख्या में अवैध नल कनेक्शन भी पेयजल व्यवस्था पर दबाव बढ़ाने का कारण बन रहे हैं। मुख्य पाइपलाइन से सीधे जोड़कर पानी लेने की शिकायतें वर्षों से सामने आती रही हैं।
यदि ऐसा है तो बड़ा प्रश्न यह है—
क्या जिम्मेदार विभागों को इसकी जानकारी नहीं?
यदि जानकारी है तो प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
यदि कार्रवाई हुई तो हालात सुधरे क्यों नहीं?
नगर क्षेत्र में लगभग 200 किलोमीटर से अधिक पाइपलाइन नेटवर्क के माध्यम से जल वितरण व्यवस्था संचालित होने की जानकारी सामने आती रही है। शहर के 39 वार्डों में प्रतिदिन भारी मात्रा में जलापूर्ति किए जाने के दावे भी किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्थिति इन दावों से अलग तस्वीर दिखा रही है।
कई क्षेत्रों के लोग पानी संग्रह करने के लिए निजी टंकियों और वैकल्पिक व्यवस्थाओं पर निर्भर होने को मजबूर हैं। जिन परिवारों के पास संसाधन सीमित हैं, उनकी परेशानी और बढ़ जाती है।
गांवों में पहले से संकट, अब शहर भी प्रभावित
दमोह जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति पहले से चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। कई गांवों में खराब हैंडपंप समय पर ठीक नहीं हो पाते। कई क्षेत्रों में भूजल स्तर नीचे जाने से गर्मी के मौसम में संकट और गहरा जाता है।
महिलाओं और बुजुर्गों को पानी के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। कई परिवारों का रोज का बड़ा समय केवल पानी की व्यवस्था करने में निकल जाता है।
अब यही संकट नगर क्षेत्र में भी दिखाई देने लगा है।
करोड़ों रुपये खर्च, फिर भी संकट क्यों?
केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा वर्षों से पेयजल योजनाओं पर बड़े स्तर पर धन खर्च किया गया है। जल जीवन मिशन सहित विभिन्न योजनाओं के माध्यम से पाइपलाइन विस्तार, पेयजल संरचना निर्माण और जल वितरण व्यवस्था मजबूत करने पर लगातार बजट स्वीकृत हुए।
लेकिन बड़ा सवाल यही है—
यदि योजनाएं बनीं तो जमीनी असर कहां है?
यदि पाइपलाइन व्यवस्था मजबूत हुई तो नागरिकों को 2–3 दिन में पानी क्यों मिल रहा है?
यदि अवैध कनेक्शन समस्या हैं तो कार्रवाई क्यों नहीं?
यदि व्यवस्था प्रभावित है तो जवाबदेही किसकी तय होगी?
जवाबदेही तय होगी या नहीं?
पेयजल जैसी मूलभूत सुविधा प्रभावित होने के बावजूद जिम्मेदारी तय न होना भी बड़ा प्रश्न बनता जा रहा है।
यदि जल वितरण व्यवस्था कमजोर है तो जिम्मेदार कौन?
यदि निगरानी कमजोर है तो जवाबदेही किसकी?
यदि करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी आम नागरिक परेशान हैं तो जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई कब होगी?
दमोह में पानी अब केवल सुविधा का विषय नहीं रह गया है। यह अब प्रशासनिक जवाबदेही, निगरानी व्यवस्था और योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन का बड़ा सवाल बन चुका है।
गर्मी बढ़ रही है, संकट बढ़ रहा है, लेकिन नागरिकों की उम्मीद आज भी उसी सवाल पर टिकी है—
क्या दमोह को नियमित पानी मिलेगा या हर साल गर्मी के साथ यही संकट लौटता रहेगा?
