नई दिल्ली । चंडीगढ़ में पारंपरिक, पूरक और एकीकृत चिकित्सा (टीसीआईएम) पर केंद्रित चार दिवसीय ब्रिक्स बैठक का मंगलवार से शुभारंभ हो गया। भारत की अध्यक्षता में आयोजित इस महत्वपूर्ण सम्मेलन में 21 देशों के स्वास्थ्य मंत्री, वरिष्ठ अधिकारी, नीति निर्माता और चिकित्सा विशेषज्ञ भाग ले रहे हैं। बैठक का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं के साथ बेहतर तरीके से जोड़ना, अनुसंधान को बढ़ावा देना और सदस्य देशों के बीच सहयोग को मजबूत करना है।
सम्मेलन के दौरान पारंपरिक चिकित्सा से जुड़े वैज्ञानिक अनुसंधान, नियामकीय ढांचे, क्षमता निर्माण और ज्ञान के आदान-प्रदान जैसे विषयों पर व्यापक चर्चा की जा रही है। भारत का प्रयास है कि सदस्य देशों के अनुभवों और विशेषज्ञता का लाभ साझा मंच पर उपलब्ध हो, जिससे पारंपरिक चिकित्सा को वैश्विक स्वास्थ्य प्रणाली में अधिक प्रभावी स्थान मिल सके।
बैठक में भाग ले रहे विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों ने पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में आपसी सहयोग को महत्वपूर्ण बताया। प्रतिनिधियों का मानना है कि वैज्ञानिक शोध, प्रमाण आधारित चिकित्सा और प्रभावी नियामकीय व्यवस्था के माध्यम से पारंपरिक उपचार पद्धतियों को अधिक विश्वसनीय और व्यापक बनाया जा सकता है। साथ ही इन प्रणालियों को जनस्वास्थ्य सेवाओं का पूरक बनाकर लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकती हैं।
सम्मेलन के दौरान यह भी रेखांकित किया गया कि विभिन्न देशों में पारंपरिक चिकित्सा की अपनी समृद्ध विरासत और विशिष्ट उपचार पद्धतियां मौजूद हैं। योग, आयुर्वेद, प्राकृतिक चिकित्सा और अन्य पारंपरिक उपचार प्रणालियों के अनुभवों को साझा करने से सदस्य देशों को एक-दूसरे से सीखने और स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक प्रभावी बनाने का अवसर मिलेगा। विशेषज्ञों ने इस क्षेत्र में संयुक्त अनुसंधान और प्रशिक्षण कार्यक्रमों को भी आवश्यक बताया।
भारत ने अपनी ब्रिक्स अध्यक्षता के दौरान पारंपरिक, पूरक और एकीकृत चिकित्सा के लिए एक स्थायी कार्य समूह के गठन का प्रस्ताव रखा है। इस प्रस्ताव पर सदस्य देशों के बीच सकारात्मक चर्चा हुई और इसे आगे बढ़ाने पर सहमति बनी। माना जा रहा है कि यह कार्य समूह भविष्य में शोध, नीति निर्माण, प्रशिक्षण और सहयोग से जुड़े कार्यक्रमों के समन्वय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
बैठक के पहले दिन पारंपरिक चिकित्सा में क्षमता निर्माण और अनुसंधान पर विशेष सत्र आयोजित किया गया, जिसमें सभी सदस्य देशों के प्रतिनिधियों ने अपने अनुभव और सुझाव साझा किए। इस दौरान चिकित्सा शिक्षा, अनुसंधान संस्थानों के बीच सहयोग, नई तकनीकों के उपयोग और स्वास्थ्य सेवाओं में पारंपरिक चिकित्सा की भूमिका जैसे विषयों पर विस्तार से विचार-विमर्श हुआ।
चंडीगढ़ में आयोजित यह सम्मेलन भारत की पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सदस्य देशों के बीच अनुसंधान, प्रशिक्षण और तकनीकी सहयोग को संस्थागत रूप दिया जाता है, तो इससे वैश्विक स्वास्थ्य क्षेत्र में पारंपरिक चिकित्सा की स्वीकार्यता और उपयोग दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। सम्मेलन के आगामी सत्रों में स्वास्थ्य मंत्रियों की बैठक के दौरान कई महत्वपूर्ण प्रस्तावों और सहयोगी पहलों पर भी चर्चा होने की संभावना है।
