नई दिल्ली ।कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने सनातन धर्म और हिंदुत्व को अलग-अलग बताते हुए भारतीय जनता पार्टी की वैचारिक सोच पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा जिस हिंदुत्व की बात करती है, उसका सनातन धर्म से कोई संबंध नहीं है। उनके अनुसार, सनातन धर्म सभी धर्मों का सम्मान करने और पूरी दुनिया के कल्याण की भावना पर आधारित है, जबकि हिंदुत्व की राजनीति नफरत को बढ़ावा देती है। उनके इस बयान के बाद सनातन धर्म और हिंदुत्व की परिभाषा को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है।
दिग्विजय सिंह ने शुक्रवार को मध्य प्रदेश के गुना जिले में मीडिया से बातचीत के दौरान ये बातें कहीं। वह उज्जैन से उत्तर प्रदेश के अयोध्या तक ‘सत्य सनातन स्वाभिमान यात्रा’ कर रहे हैं। इसी यात्रा के दौरान उन्होंने भाजपा और उससे जुड़े संगठनों की विचारधारा पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि भाजपा ने सनातन धर्म का उल्लेख तब शुरू किया, जब उन्होंने इस विषय को उठाया। उनके मुताबिक, भाजपा की विचारधारा सनातन धर्म के बजाय हिंदुत्व पर आधारित है।
कांग्रेस नेता ने अपने बयान में विनायक दामोदर सावरकर का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि सावरकर ने स्वयं हिंदुत्व को धर्म से अलग बताया था। दिग्विजय सिंह के अनुसार, हिंदुत्व और हिंदू धर्म को एक ही अर्थ में देखना उचित नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि हिंदुत्व के नाम पर नफरत फैलाने की कोशिश की जाती है, जबकि हिंदू धर्म का मूल भाव इससे अलग है। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद पर भी ऐसी विचारधारा को बढ़ावा देने का आरोप लगाया, जिसे वह समाज में विभाजन और नफरत से जोड़ते हैं।
दिग्विजय सिंह ने सनातन धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि इसका व्यापक अर्थ सभी धर्मों के प्रति सम्मान और संपूर्ण विश्व के कल्याण की कामना करना है। उनके मुताबिक, सनातन परंपरा किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सबके हित की भावना निहित है। उन्होंने भाजपा पर इस व्यापक विचार को अपनी राजनीतिक व्याख्या के अनुसार प्रस्तुत करने का आरोप लगाया।
इस मुद्दे पर कांग्रेस नेता उदित राज ने भी भाजपा और आरएसएस की विचारधारा की आलोचना की। उन्होंने हिंदुत्व की परिभाषा को लेकर सावरकर के विचारों का उल्लेख करते हुए जन्मभूमि और पुण्यभूमि की अवधारणा पर सवाल उठाए। उदित राज के अनुसार, इस परिभाषा में किसी व्यक्ति की जन्मभूमि और उसके धार्मिक पवित्र स्थल के बीच अंतर को महत्व दिया गया है। उन्होंने कहा कि इस आधार पर भारत में जन्म लेने वाले मुसलमानों और ईसाइयों को जन्मभूमि तो भारत में मिलती है, लेकिन उनकी धार्मिक पुण्यभूमि को लेकर अलग नजरिया अपनाया जाता है।
उदित राज ने इस अवधारणा को लोगों के बीच भेदभाव पैदा करने वाला बताया। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में विभिन्न समुदायों के योगदान का भी जिक्र किया। उनके दावे के मुताबिक, आजादी की लड़ाई में लगभग 61 हजार मुसलमानों और करीब आठ हजार सिखों ने अपनी जान कुर्बान की थी। उन्होंने हिंदुओं के योगदान को इसके मुकाबले नगण्य बताते हुए विवादित टिप्पणी भी की। ये आंकड़े और उनका आकलन उदित राज के दावे के रूप में सामने आए हैं।
उन्होंने भाजपा और आरएसएस को देश के इतिहास तथा स्वतंत्रता संग्राम में विभिन्न समुदायों की भूमिका पर चर्चा करने की चुनौती दी। उदित राज ने हिंदुत्व की राजनीति को समाज को बांटने की कोशिश बताते हुए सवाल किया कि इस विचारधारा में हिंदू होने की पहचान किस आधार पर तय की जाती है।
दिग्विजय सिंह और उदित राज के इन बयानों ने एक बार फिर भारतीय राजनीति में धर्म, धार्मिक पहचान और विचारधारा को लेकर बहस को सामने ला दिया है। दोनों नेताओं ने भाजपा और आरएसएस की हिंदुत्व संबंधी सोच पर सवाल उठाए हैं। वहीं, दिग्विजय सिंह ने अपनी यात्रा के दौरान सनातन धर्म को सभी के सम्मान और विश्व कल्याण से जोड़ते हुए अपनी वैचारिक स्थिति स्पष्ट की है।
