शाहपुर की साडू माता नी पोल में हर साल नवरात्रि की आठवीं रात पुरुष एकत्र होते हैं और पारंपरिक तरीके से गरबा करते हैं। इस आयोजन में बारोट समुदाय के लोगों के साथ दूसरे समुदायों के लोग भी भाग लेते हैं। इस वर्ष भी कम से कम 40 पुरुष इस परंपरा में शामिल हुए। इनमें मुस्लिम समुदाय के लोग भी मौजूद थे। यह आयोजन अलग-अलग समुदायों की भागीदारी के साथ परंपरा के प्रति लोगों की आस्था को दर्शाता है।
60 वर्षीय सतीश बारोट ने बताया कि वह 40 साल से अधिक समय से इस रस्म का हिस्सा बनते आ रहे हैं। वहीं, सुरेंद्रनगर से पिंटू बारोट अपने परिवार के साथ इस आयोजन में शामिल होने पहुंचे। उनके 10 वर्षीय बेटे, भाई और भतीजे ने पहली बार इस परंपरा में भाग लिया। इस तरह परिवार की नई पीढ़ी भी इस पुरानी रस्म से जुड़ रही है।
स्थानीय लोगों के मुताबिक, इस परंपरा की शुरुआत लगभग 200 साल पहले हुई एक घटना से जुड़ी है। मान्यता है कि बारोट समुदाय की साडू माता अपनी असाधारण सुंदरता के लिए जानी जाती थीं। उस समय के शासक ने उन्हें दरबार में पेश करने का आदेश दिया था। इस आदेश को पूरा कराने के लिए सैनिकों की एक टुकड़ी भेजी गई थी।
स्थानीय मान्यता के अनुसार, समुदाय के लोगों ने साडू माता को उनकी इच्छा के विरुद्ध दरबार ले जाने का विरोध किया। इस दौरान सैनिकों और समुदाय के लोगों के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो गई। बताया जाता है कि खतरा बढ़ने पर साडू माता ने पहले अपनी बेटी अजूबा की जान ले ली। इसके बाद उन्होंने अपने पति हाथीसिंह बारोट से कहा कि उन्हें शाही दरबार में ले जाने देने के बजाय तलवार के एक वार से उनकी जान ले लें। मान्यता के अनुसार, इसके बाद साडू माता की मृत्यु हो गई।
इस घटना के बाद समुदाय के लोगों को गहरा पछतावा हुआ कि वे साडू माता की रक्षा नहीं कर सके। स्थानीय विश्वास के मुताबिक, उनकी मृत्यु के बाद समुदाय के परिवारों पर श्राप लगने की आशंका जताई जाने लगी। लोगों का दावा था कि परिवारों में पुरुषों की मौतें होने लगीं और वंश को आगे बढ़ाने में कठिनाइयां आने लगीं।
इसके बाद समुदाय के लोग साडू माता के स्मारक पर एकत्र हुए। उन्होंने अपनी गलती के लिए प्रायश्चित किया और परिवारों की खुशहाली तथा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रार्थना की। इसी दौरान पुरुषों ने साडू माता से जुड़े वस्त्र पहनने का संकल्प लिया। समुदाय का विश्वास है कि प्रार्थनाओं के बाद परिवारों की वंश-परंपरा फिर आगे बढ़ने लगी। समय के साथ साड़ी पहनकर गरबा करने की यह रस्म नवरात्रि की आठवीं रात की स्थायी परंपरा बन गई।
आज इस आयोजन में शामिल होने वाले पुरुष इसे केवल नृत्य या धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि आस्था, भक्ति, कृतज्ञता और सामूहिक प्रायश्चित के प्रतीक के रूप में देखते हैं। अहमदाबाद के शाहपुर में निभाई जाने वाली यह परंपरा गुजरात के नवरात्रि उत्सव की विविधता और स्थानीय लोकविश्वासों से जुड़ी पुरानी स्मृतियों को सामने लाती है।
