नई दिल्ली ।देशभर में दशहरे के अवसर पर रावण के पुतले का दहन करके बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाता है, लेकिन महाराष्ट्र के अकोला जिले में स्थित सांगोला गांव की परंपरा इससे बिल्कुल अलग है। यहां विजयादशमी के दिन रावण का पुतला जलाने के बजाय दस सिरों वाले दशानन की पूजा की जाती है। पातुर तहसील के इस गांव में ग्रामीण रावण को अपना ग्राम देवता और रक्षक मानते हैं। उनकी मान्यता है कि रावण की आराधना से गांव में सुख-समृद्धि बनी रहती है। करीब 350 वर्षों से चली आ रही इस परंपरा में आज भी गांव के लोग उत्साह और श्रद्धा के साथ शामिल होते हैं।
सांगोला में दशहरे के दिन विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। इस दौरान गांव के लोग एकत्र होकर अपनी पुरानी धार्मिक परंपरा निभाते हैं। यहां रावण की प्रतिमा की पूजा केवल दशहरे तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे साल नियमित रूप से उसकी आराधना की जाती है। महिलाएं भी इस परंपरा में श्रद्धापूर्वक भाग लेती हैं। देश के कई हिस्सों में जहां दशहरा रावण दहन के साथ मनाया जाता है, वहीं सांगोला में उसकी पूजा गांव की विशिष्ट पहचान बन चुकी है।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, रावण की पूजा की शुरुआत लगभग 350 साल पहले हुई थी। बताया जाता है कि उस समय गांव में एक ऋषि महाराज रहते थे, जिन्हें ग्रामीण श्रद्धा की दृष्टि से देखते थे। मान्यता है कि अपने अंतिम समय में ऋषि महाराज ने ऐसी प्रतिमा स्थापित करने की इच्छा जताई थी, जिसमें दस बिंदु या चिह्न हों। हालांकि, प्रतिमा बनाने वाले मूर्तिकार ने दस मुखों वाली प्रतिमा तैयार कर दी। यह प्रतिमा रावण के स्वरूप जैसी दिखाई देती थी।
ग्रामीणों के अनुसार, जब इस प्रतिमा को बैलगाड़ी से गांव लाया जा रहा था, तब बैलगाड़ी गांव की सीमा पार नहीं कर सकी। इस घटना को ग्रामीणों ने दैवी संकेत के रूप में देखा। इसके बाद प्रतिमा को उसी स्थान पर स्थापित कर दिया गया। इसी घटना को सांगोला में रावण को ग्राम देवता मानकर पूजा करने की परंपरा की शुरुआत से जोड़कर देखा जाता है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती यह लोकमान्यता आज भी गांव के धार्मिक जीवन का हिस्सा है।
रावण के भक्त ज्ञानेश्वर महाराज धाकरे के अनुसार, गांव में दशानन की पूजा उसके चरित्र के प्रत्येक पहलू का समर्थन करने के उद्देश्य से नहीं की जाती। उनके मुताबिक, रावण की भगवान शिव के प्रति भक्ति, आराधना और साधना के सम्मान में उसकी पूजा होती है। उनका कहना है कि रावण सोने की लंका का राजा था और गांव के लोग उसकी आराधना करते हुए अपने गांव को भी सुखी तथा समृद्ध मानते हैं। ग्रामीण इस खुशहाली को रावण महाराज की कृपा से जोड़ते हैं।
सांगोला के निवासियों का विश्वास है कि रावण महाराज की पूजा से गांव में सुख-समृद्धि बनी रहती है और संकटों से रक्षा होती है। इसी आस्था के कारण दशहरे पर होने वाला पूजन पूरे गांव के लिए विशेष महत्व रखता है। महिलाओं सहित ग्रामीणों की सामूहिक भागीदारी इस परंपरा को जीवंत बनाए हुए है। करीब साढ़े तीन सदियों से चली आ रही यह मान्यता दिखाती है कि देश के अलग-अलग क्षेत्रों में दशहरे से जुड़ी धार्मिक परंपराएं स्थानीय इतिहास, लोकविश्वास और समुदाय की आस्था के अनुसार अलग-अलग रूप लेती हैं।
