गंभीर हालत में जबलपुर रेफर, बिना संकेत दौड़ रहे ट्रैक्टरों पर फिर उठे सवाल; क्या किसी बड़ी मौत का इंतजार कर रहा है यातायात तंत्र?

दमोह, 3 मई/जिला मुख्यालय से कुछ ही किलोमीटर दूर ग्राम समन्ना के समीप रविवार रात्रि एक भयावह सड़क हादसे ने एक बार फिर दमोह जिले में बेलगाम दौड़ रहे ट्रैक्टर-ट्रॉली संचालन और यातायात विभाग की ढुलमुल व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी। लोहे के सरियों से लदी एक ट्रैक्टर-ट्रॉली, जिसमें न तो कोई रिफ्लेक्टर था, न चेतावनी संकेत और न ही पीछे सुरक्षा लाइट की समुचित व्यवस्था — उसके निकले हुए सरिए सीधे पीछे से आ रहे मोटरसाइकिल सवार युवक के पेट में जा घुसे। हादसा इतना वीभत्स था कि मौके पर मौजूद लोग दहल उठे।
घटना में गंभीर रूप से घायल युवक की पहचान ग्राम सतरिया निवासी दामोदर पटेल के रूप में हुई है, जिसे स्थानीय ग्रामीणों और 112 डायल पुलिस की मदद से तत्काल जिला चिकित्सालय पहुंचाया गया। यहां चिकित्सकों ने प्राथमिक उपचार के बाद हालत नाजुक देखते हुए उसे मेडिकल कॉलेज Netaji Subhash Chandra Bose Medical College रेफर कर दिया।
रात के अंधेरे में मौत बनकर दौड़ रही थी ट्रॉली
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार ट्रैक्टर-ट्रॉली में लंबी लोहे की सरिया पीछे की ओर कई फीट तक निकली हुई थी, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से उस पर किसी प्रकार का लाल कपड़ा, रिफ्लेक्टर, फ्लोरोसेंट बोर्ड या चेतावनी लाइट नहीं लगाई गई थी। ट्रॉली के पीछे पर्याप्त बैक लाइट भी नहीं थी, जिससे रात के अंधेरे में पीछे चल रहे वाहन चालक को खतरे का अनुमान तक नहीं हो सका।
जैसे ही बाइक सवार नजदीक पहुंचा, निकला हुआ सरिया उसके पेट में घुस गया और वह गंभीर रूप से लहूलुहान होकर सड़क पर गिर पड़ा। ग्रामीणों ने बताया कि कुछ क्षणों के लिए घटनास्थल पर अफरा-तफरी मच गई और घायल दर्द से तड़पता रहा।
लोकनाथ न्यूज़ ने पहले ही चेताया था, फिर भी नहीं जागा अमला
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह दुर्घटना अचानक हुई त्रासदी है या फिर प्रशासनिक लापरवाही से उपजा हुआ पूर्व घोषित खतरा?
उल्लेखनीय है कि गत माह लोकनाथ न्यूज़ द्वारा दमोह जिले में बिना नंबर, बिना रिफ्लेक्टर, बिना संकेत और बिना मानक सुरक्षा उपकरणों के रात में दौड़ रही ट्रैक्टर-ट्रॉलियों पर प्रमुखता से समाचार प्रकाशित कर यातायात पुलिस, परिवहन अमले और जिला प्रशासन का ध्यान आकृष्ट कराया गया था। समाचार में स्पष्ट चेतावनी दी गई थी कि यदि इन पर तत्काल अंकुश नहीं लगाया गया तो कभी भी गंभीर जनहानि हो सकती है। किंतु विभागीय उदासीनता का आलम यह रहा कि न तो विशेष चेकिंग अभियान चला, न ट्रैक्टर चालकों पर दंडात्मक कार्रवाई हुई और न ही सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित कराया गया।
अब समन्ना के पास हुआ यह हादसा उसी अनदेखी का प्रत्यक्ष परिणाम माना जा रहा है।
बिना नंबर, बिना रिफ्लेक्टर, सामने एक लाइट और सड़क पर फर्राटा
जिले के ग्रामीण एवं अर्धशहरी मार्गों पर इन दिनों बड़ी संख्या में ट्रैक्टर-ट्रॉलियां निर्माण सामग्री, सरिया, गिट्टी, रेत, कृषि उपज और अन्य सामान लेकर दिन-रात दौड़ती देखी जा सकती हैं। इनमें से अधिकांश ट्रॉलियों पर—
- नंबर प्लेट नहीं,
- पीछे रिफ्लेक्टर नहीं,
- इंडिकेटर नहीं,
- निकले माल पर चेतावनी चिह्न नहीं,
- और कई बार केवल सामने एक हल्की लाइट जलाकर सड़क नापी जाती है।
ऐसी स्थिति में पीछे से आने वाले दोपहिया और चारपहिया वाहन चालकों के लिए ये चलते-फिरते हादसे साबित हो रहे हैं। बावजूद इसके संबंधित विभागों की चुप्पी सवालों के घेरे में है।
यातायात पुलिस की मौजूदगी सिर्फ चालान तक सीमित?
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि शहर में हेलमेट और सीट बेल्ट जांच के नाम पर कार्रवाई तो दिखाई देती है, लेकिन ग्रामीण मार्गों पर खुलेआम मौत बनकर दौड़ रहे भारी और असुरक्षित वाहनों पर कोई कठोर नियंत्रण नहीं है। समन्ना हादसे के बाद लोगों में यह चर्चा तेज है कि क्या यातायात पुलिस केवल आसान चालान वसूली तक सीमित होकर रह गई है? क्या सड़क सुरक्षा का वास्तविक खतरा विभाग को दिखाई नहीं देता?
पुलिस जांच में जुटी, लेकिन जिम्मेदार कौन?
घटना की सूचना पर पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच प्रारंभ कर दी है। ट्रैक्टर-ट्रॉली चालक की पहचान और वाहन की तकनीकी स्थिति की जानकारी जुटाई जा रही है। हालांकि स्थानीय लोगों का कहना है कि केवल एक चालक पर मामला दर्ज कर देने से समस्या खत्म नहीं होगी, जब तक जिले भर में असुरक्षित ट्रैक्टर-ट्रॉली संचालन पर व्यापक अभियान नहीं चलाया जाता।
समन्ना की यह घटना केवल एक सड़क दुर्घटना नहीं, बल्कि प्रशासनिक सुस्ती का वह आईना है जिसमें साफ दिख रहा है कि चेतावनियों के बावजूद जिम्मेदार अमला जागने को तैयार नहीं। अब देखना यह है कि दामोदर पटेल की जिंदगी से जूझती सांसें क्या विभागीय संवेदनहीनता को झकझोर पाएंगी या फिर अगली बड़ी दुर्घटना तक फाइलें यूं ही बंद रहेंगी।
