जर्जर स्कूल भवन की समस्या लेकर कलेक्ट्रेट पहुंचे नन्हे छात्र-छात्राएं — प्रशासन ने सुधार का भरोसा दिया, लेकिन बच्चों को प्रदर्शन में लाने की प्रवृत्ति पर गंभीर सवाल

(डॉ.एल.एन.वैष्णव )
दमोह में एक जर्जर स्कूल भवन की समस्या को लेकर छोटे-छोटे छात्र-छात्राओं का कलेक्ट्रेट पहुंचकर प्रदर्शन करना महज एक स्थानीय घटना नहीं है। यह घटना अपने पीछे कई ऐसे सवाल छोड़ गई है, जिन पर परिवार, समाज, शिक्षा व्यवस्था और प्रशासन सभी को गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।बच्चों की मांग गलत नहीं थी। यदि विद्यालय का भवन जर्जर हो चुका है, बच्चों को सुरक्षित वातावरण में पढ़ाई नहीं मिल रही है और स्कूल की जगह यज्ञशाला में कक्षाएं संचालित करनी पड़ रही हैं, तो निश्चित रूप से यह व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है। बच्चों को सुरक्षित भवन और बेहतर शैक्षणिक वातावरण उपलब्ध कराना शासन-प्रशासन की जिम्मेदारी है।
लेकिन सवाल यहां से आगे शुरू होता है।
क्या अपनी समस्याओं को लेकर नन्हे बच्चों को सरकारी कार्यालयों तक प्रदर्शन के लिए लाना जरूरी है? क्या जिन हाथों में किताब और कॉपी होनी चाहिए, उनमें आंदोलन की तख्तियां और नारे होने चाहिए? क्या बच्चों को छोटी उम्र से ही यह सिखाया जाना चाहिए कि समस्या का समाधान प्रदर्शन और नारेबाजी के जरिए ही संभव है?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या बच्चों की समस्याओं को सामने रखने की जिम्मेदारी स्वयं बच्चों की है या उनके अभिभावकों और जिम्मेदार वयस्कों की?
जर्जर स्कूल ने खोली व्यवस्था की तस्वीर
बताया गया है कि संबंधित विद्यालय का भवन जर्जर स्थिति में पहुंच चुका है और बच्चों की कक्षाएं स्कूल भवन के बजाय यज्ञशाला में संचालित की जा रही हैं। यदि यह स्थिति लंबे समय से बनी हुई है तो निश्चित रूप से संबंधित विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
बच्चों को सुरक्षित भवन में पढ़ने का अधिकार है। शिक्षा केवल किताबों और शिक्षकों तक सीमित नहीं है। स्कूल का भवन, बैठने की व्यवस्था, पेयजल, शौचालय, प्रकाश, सुरक्षा और अध्ययन के लिए अनुकूल वातावरण भी शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा हैं।
ऐसे में यह जांच होना आवश्यक है कि विद्यालय भवन कब जर्जर हुआ? उसकी मरम्मत की जरूरत कब सामने आई? संबंधित अधिकारियों को इसकी जानकारी कब मिली? मरम्मत के लिए राशि जारी हुई या नहीं? यदि राशि जारी हुई तो उसका उपयोग किस प्रकार हुआ? और यदि भवन की मरम्मत संभव नहीं थी तो वैकल्पिक व्यवस्था के लिए समय रहते कदम क्यों नहीं उठाए गए? इन सवालों के जवाब केवल इस स्कूल के लिए नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की जवाबदेही तय करने के लिए जरूरी हैं।
कलेक्टर ने माना मामला गंभीर
कलेक्टर प्रताप नारायण यादव ने मामले को गंभीरता से लेते हुए संबंधित अधिकारियों को आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। उन्होंने कहा कि स्कूल भवन के जर्जर होने की सूचना प्राप्त हुई है और यह देखा जाएगा कि मरम्मत के लिए कितनी राशि जारी हुई, कब जारी हुई, किन-किन विद्यालयों को राशि मिली और उसका कितना उपयोग किया गया।
यह जांच इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यदि किसी विद्यालय की मरम्मत के लिए शासन से राशि आती है और उसके बावजूद बच्चे जर्जर भवन में पढ़ने को मजबूर होते हैं, तो सवाल केवल भवन की स्थिति का नहीं बल्कि उस पूरी प्रक्रिया का है जिसके तहत सरकारी धन खर्च किया जाता है।
यदि कहीं कमी है तो उसे दूर किया जाना चाहिए और यदि कहीं लापरवाही हुई है तो उसकी जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।
लेकिन बच्चों को प्रदर्शन में लाना क्यों?
कलेक्टर ने बच्चों के कलेक्ट्रेट पहुंचकर प्रदर्शन करने को लेकर भी चिंता व्यक्त की। उनका कहना था कि यदि कोई समस्या थी तो बच्चों के माता-पिता, अभिभावक या संबंधित लोग प्रशासन के सामने अपनी शिकायत रख सकते थे। बच्चों को इस तरह प्रदर्शन के लिए लाना उचित नहीं है।यह बात अपने आप में एक बड़ी सामाजिक बहस को जन्म देती है।लोकतंत्र में अपनी बात रखना नागरिक अधिकार है। विरोध भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन क्या हर उम्र के व्यक्ति की भूमिका एक जैसी होनी चाहिए?एक बच्चा यदि अपने स्कूल की समस्या बताता है तो उसकी बात सुनी जानी चाहिए। लेकिन बच्चे को किसी राजनीतिक, सामाजिक या प्रशासनिक मांग के प्रदर्शन में आगे खड़ा करना और उससे नारे लगवाना एक अलग विषय है।बच्चे किसी भी समाज की सबसे संवेदनशील पीढ़ी होते हैं। वे जो देखते हैं, उसे सीखते हैं। जिस वातावरण में उनका बचपन गुजरता है, वही आगे उनके व्यक्तित्व का आधार बनता है।
जैन-जी से अल्फा जनरेशन तक पहुंचती तस्वीर
पिछले कुछ समय में सार्वजनिक जीवन में युवा और नई पीढ़ी की सक्रियता बढ़ी है। यह लोकतंत्र के लिए सकारात्मक संकेत भी हो सकता है। लेकिन अब यदि छोटी उम्र के बच्चों को भी विभिन्न समस्याओं को लेकर प्रदर्शन में आगे लाया जाने लगे तो यह सोचने का समय है कि हम आने वाली पीढ़ी को किस दिशा में ले जा रहे हैं।
जैन-जी के बाद अल्फा जनरेशन के बच्चों की यह तस्वीर केवल एक स्कूल तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह समाज के लिए आईना है।बच्चों को अपने अधिकारों के बारे में जानकारी होनी चाहिए। उन्हें सवाल पूछना आना चाहिए। उन्हें गलत और सही में अंतर समझना चाहिए। उन्हें अपनी बात रखने का आत्मविश्वास भी होना चाहिए।
लेकिन इसके साथ यह भी जरूरी है कि उन्हें यह सिखाया जाए कि हर समस्या के समाधान के कई लोकतांत्रिक रास्ते होते हैं।
शिकायत करना, आवेदन देना, अभिभावकों के माध्यम से अधिकारियों तक बात पहुंचाना, जनप्रतिनिधियों से मिलना, स्कूल प्रबंधन से चर्चा करना और संबंधित विभाग को जानकारी देना—ये सभी रास्ते मौजूद हैं।
बच्चों के मन पर क्या असर पड़ेगा?
यह सवाल भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि लगातार प्रदर्शन, नारेबाजी और सार्वजनिक विरोध का बच्चों के मन पर क्या प्रभाव पड़ता है।
बच्चे स्वभाव से अनुकरण करने वाले होते हैं। वे बड़ों के व्यवहार को देखकर सीखते हैं। यदि उन्हें बार-बार यह अनुभव कराया जाए कि समस्या सामने आते ही समूह बनाकर नारे लगाना और प्रदर्शन करना ही सबसे प्रभावी रास्ता है, तो भविष्य में वे समस्याओं को बातचीत और संस्थागत प्रक्रिया के बजाय टकराव के माध्यम से हल करने की ओर आकर्षित हो सकते हैं।
यह कोई निश्चित निष्कर्ष नहीं, लेकिन एक गंभीर सामाजिक चिंता जरूर है।बच्चों में नेतृत्व की भावना विकसित करना अच्छी बात है। उन्हें जागरूक नागरिक बनाना भी जरूरी है। लेकिन जागरूकता और आंदोलन की संस्कृति में अंतर है।बच्चों को अधिकारों के साथ जिम्मेदारियों की शिक्षा भी मिलनी चाहिए।
सवाल प्रशासन से भी है और समाज से भी
इस पूरे मामले में सवाल केवल बच्चों को प्रदर्शन के लिए लाने वालों से नहीं है।सवाल प्रशासन से भी है।यदि स्कूल भवन जर्जर था तो इसकी जानकारी समय पर क्यों नहीं हुई? यदि जानकारी थी तो समाधान क्यों नहीं हुआ? यदि मरम्मत के लिए राशि उपलब्ध थी तो उसका उपयोग किस प्रकार हुआ? और यदि भवन में पढ़ाई कराना सुरक्षित नहीं था तो वैकल्पिक व्यवस्था पहले क्यों नहीं की गई?
सवाल शिक्षा विभाग से भी है।क्या जिले के सभी सरकारी स्कूल भवनों की नियमित जांच होती है? क्या जर्जर भवनों की सूची तैयार है? क्या मरम्मत के लिए जारी राशि की निगरानी होती है? क्या विद्यालय स्तर पर शिकायतों के समाधान की कोई प्रभावी व्यवस्था है?सवाल अभिभावकों से भी है।क्या हम बच्चों की समस्याओं को समझकर खुद आगे आने के बजाय उन्हें आगे कर रहे हैं? क्या बच्चों को अपनी मांगों का चेहरा बनाना उचित है?और सवाल समाज से भी है।क्या हम बच्चों को जागरूक बना रहे हैं या उन्हें समय से पहले संघर्ष की दुनिया में धकेल रहे हैं?
बच्चे आंदोलन का चेहरा नहीं, भविष्य का चेहरा हैं
यह बात समझने की जरूरत है कि बच्चों की आवाज को दबाना इस रिपोर्ट का उद्देश्य नहीं है। इसके उलट बच्चों की आवाज सबसे पहले सुनी जानी चाहिए।लेकिन उनकी समस्याओं को उठाने की जिम्मेदारी बड़ों को निभानी चाहिए।यदि स्कूल की छत खराब है तो अभिभावक आवाज उठाएं। यदि भवन जर्जर है तो जनप्रतिनिधि सवाल करें। यदि अधिकारी लापरवाही कर रहे हैं तो वरिष्ठ अधिकारी कार्रवाई करें। यदि सरकारी राशि का दुरुपयोग हुआ है तो जांच हो। यदि व्यवस्था में कमी है तो उसे दूर किया जाए।बच्चे केवल इतना करें कि वे पढ़ें, सीखें, सवाल पूछें और अपने भविष्य को मजबूत बनाएं।क्योंकि लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए बच्चों को आंदोलनकारी बनाने की जरूरत नहीं है। उन्हें जागरूक, संवेदनशील, जिम्मेदार और प्रश्न पूछने वाला नागरिक बनाना ज्यादा जरूरी है।
एक जर्जर भवन और कई सवाल
दमोह की यह घटना आने वाले दिनों में शायद केवल एक स्कूल की मरम्मत की खबर बनकर रह जाए। संभव है कि भवन की मरम्मत हो जाए, बच्चे फिर स्कूल भवन में पढ़ने लगें और समस्या समाप्त हो जाए।लेकिन इस घटना से उठे सवाल इतने आसानी से समाप्त नहीं होने चाहिए।क्या सरकारी स्कूलों की स्थिति की नियमित निगरानी होगी?क्या मरम्मत के लिए जारी राशि के उपयोग की पारदर्शी व्यवस्था बनेगी?क्या बच्चों को प्रदर्शन में लाने के बजाय अभिभावकों और जिम्मेदार लोगों को आगे आने के लिए प्रेरित किया जाएगा?क्या शिक्षा व्यवस्था बच्चों को केवल पाठ्यक्रम पढ़ाएगी या उन्हें लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने की संस्कृति भी सिखाएगी?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या हम अपने बच्चों को ऐसा बचपन दे रहे हैं, जिसमें उनके हाथों में किताबें हों, आंखों में सपने हों और मन में सवाल हों?या फिर ऐसा बचपन, जिसमें उन्हें बड़ों की समस्याओं का समाधान तलाशने के लिए सड़कों और सरकारी कार्यालयों तक पहुंचना पड़े?इस सवाल का जवाब केवल प्रशासन को नहीं, बल्कि हम सभी को देना होगा।
बच्चों की समस्याओं पर आवाज उठना जरूरी है, लेकिन बच्चों को आवाज का माध्यम बनाना जरूरी नहीं। उनकी शिक्षा, सुरक्षा और सम्मान की जिम्मेदारी बड़ों की है। अगर यह जिम्मेदारी समाज और व्यवस्था मिलकर निभाएं तो शायद किसी बच्चे को अपनी किताब छोड़कर अपनी समस्या के लिए प्रदर्शन करने की जरूरत ही न पड़े।
