गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए मध्य प्रदेश में बड़े और सर्वसुविधायुक्त विद्यालयों का नेटवर्क तैयार करने की तैयारी, लेकिन 15 हजार से अधिक सरकारी स्कूलों में 20 से कम विद्यार्थी; पिछले सात वर्षों में करीब 9,600 स्कूल घटे, अगले पांच साल में करीब 7 हजार और स्कूलों के बंद या मर्ज होने के अनुमान ने खड़े किए गंभीर सवाल

(डॉ. एल.एन. वैष्णव)
भोपाल। मध्य प्रदेश की सरकारी शिक्षा व्यवस्था इन दिनों बदलाव के एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जिसका असर आने वाले वर्षों में प्रदेश के लाखों विद्यार्थियों और हजारों सरकारी स्कूलों के भविष्य पर दिखाई दे सकता है। सरकार गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बेहतर अधोसंरचना के उद्देश्य से बड़े एवं सर्वसुविधायुक्त विद्यालयों का मॉडल विकसित कर रही है। सीएम राइज स्कूलों से शुरू हुआ यह प्रयोग अब सांदीपनि विद्यालयों तक पहुंचता दिखाई दे रहा है।
एक ओर सरकार ऐसे बड़े स्कूल तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ रही है, जहां विद्यार्थियों को बेहतर भवन, स्मार्ट क्लास, प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय, खेल सुविधाएं और आधुनिक शैक्षणिक वातावरण उपलब्ध कराया जा सके। दूसरी ओर प्रदेश में हजारों छोटे सरकारी स्कूल कम छात्र संख्या के कारण अस्तित्व के संकट का सामना कर रहे हैं।
यूडीआईएसई प्लस के आंकड़ों के मुताबिक पिछले शैक्षणिक सत्र में मध्य प्रदेश में 2,426 सरकारी स्कूल बंद हुए, जो देश में सबसे अधिक संख्या बताई गई है। वहीं अगले पांच वर्षों में करीब 7 हजार और सरकारी स्कूलों के बंद या मर्ज होने का अनुमान सामने आया है।यानी मध्य प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां सरकार बड़े और सुविधायुक्त स्कूलों का नेटवर्क तैयार करना चाहती है, लेकिन इस बदलाव के साथ यह सवाल भी सामने है कि क्या गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की कीमत छोटे गांवों और बस्तियों के स्कूलों को बंद करके चुकानी पड़ेगी?
सीएम राइज से शुरू हुआ बड़े स्कूलों का प्रयोग
मध्य प्रदेश में सरकारी स्कूलों को बड़े और आधुनिक शिक्षण संस्थानों के रूप में विकसित करने की सोच सीएम राइज स्कूलों के मॉडल से सामने आई। इसका उद्देश्य आसपास के छोटे सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों को बेहतर सुविधाओं वाले बड़े विद्यालयों में शिक्षा उपलब्ध कराना था।सीएम राइज स्कूलों की अवधारणा में बेहतर भवन, स्मार्ट क्लास, प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय, खेलकूद और अन्य आधुनिक सुविधाओं पर जोर दिया गया। इसके पीछे सोच यह थी कि सरकारी संसाधनों को छोटे-छोटे स्कूलों में सीमित रूप से उपलब्ध कराने के बजाय ऐसे बड़े विद्यालय तैयार किए जाएं, जहां विद्यार्थियों को एक ही परिसर में अधिक सुविधाएं मिल सकें।यह मॉडल सरकारी शिक्षा व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण प्रयोग के रूप में सामने आया। अब इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए सांदीपनि विद्यालयों को और बड़े स्तर पर विकसित करने की तैयारी की जा रही है।
इस तरह देखा जाए तो सीएम राइज से सांदीपनि विद्यालय तक का सफर सरकारी स्कूलों के पुनर्गठन और केंद्रीकरण की एक लंबी प्रक्रिया का अगला चरण दिखाई देता है।
अब सांदीपनि विद्यालयों पर बड़ा दांव
सांदीपनि विद्यालय योजना को प्रदेश की सरकारी शिक्षा व्यवस्था के नए मॉडल के रूप में विकसित करने की तैयारी है। योजना के दो चरणों में कुल 773 विद्यालय विकसित किए जाने हैं। इन पर करीब 24,915 करोड़ रुपये खर्च करने की योजना है।पहले चरण में 370 विद्यालय शामिल हैं। इनमें 274 स्कूल शिक्षा विभाग और 94 विद्यालय जनजातीय कार्य विभाग के हैं। इन पर करीब 13,525 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए जा रहे हैं। पहले चरण में लगभग 4.43 लाख विद्यार्थियों को प्रवेश देने का लक्ष्य है।दूसरे चरण में 405 विद्यालय प्रस्तावित हैं। इन पर करीब 11,390 करोड़ रुपये से अधिक खर्च होने की योजना है। इसमें करीब 4.05 लाख अतिरिक्त विद्यार्थियों को प्रवेश देने की क्षमता तैयार करने का लक्ष्य है।दोनों चरण पूरे होने के बाद सांदीपनि विद्यालयों में करीब 8.48 लाख विद्यार्थियों के लिए क्षमता तैयार होने की संभावना है।सरकार का लक्ष्य स्पष्ट दिखाई देता है—ऐसे बड़े विद्यालय तैयार करना जहां विद्यार्थियों को एक ही स्थान पर बेहतर शैक्षणिक एवं भौतिक सुविधाएं मिल सकें।लेकिन इस बड़े बदलाव का दूसरा पहलू छोटे सरकारी स्कूल हैं।
15,170 स्कूलों में 20 से कम विद्यार्थी
प्रदेश में करीब 15,170 सरकारी स्कूल ऐसे हैं, जहां 20 से भी कम विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। इन स्कूलों में कई जगह अतिथि शिक्षकों के माध्यम से पढ़ाई संचालित की जा रही है।सरकार के सामने तर्क यह है कि बेहद कम छात्र संख्या वाले स्कूलों में उपलब्ध संसाधनों का उपयोग प्रभावी ढंग से नहीं हो पा रहा है। कहीं एक स्कूल में विद्यार्थियों की संख्या बहुत कम है, तो दूसरी तरफ आसपास के किसी बड़े स्कूल में विद्यार्थियों की संख्या अधिक हो सकती है।ऐसे में छोटे स्कूलों को पास के बड़े विद्यालयों में मर्ज कर शिक्षकों और संसाधनों का बेहतर उपयोग करने की नीति अपनाई जा रही है।योजना के तहत लगभग एक से पांच किलोमीटर के दायरे में आने वाले छोटे स्कूलों के विद्यार्थियों को बड़े विद्यालयों में भेजने की व्यवस्था की जा रही है। विद्यार्थियों को स्कूल तक पहुंचाने के लिए बस सुविधा उपलब्ध कराने की बात भी कही गई है।
लेकिन यहीं सबसे बड़ा सवाल सामने आता है—
क्या पांच किलोमीटर की दूरी हर बच्चे के लिए समान होती है? शहर में पांच किलोमीटर की दूरी सामान्य हो सकती है, लेकिन ग्रामीण, आदिवासी और दुर्गम क्षेत्रों में यही दूरी कई परिवारों के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है।सात वर्षों में करीब 9,600 सरकारी स्कूल घटेप्रदेश में सरकारी स्कूलों की संख्या में भी लगातार गिरावट दर्ज हुई है।
वर्ष 2019-20 में प्रदेश में 99,411 सरकारी स्कूल थे। 2020-21 में यह संख्या 99,152, 2021-22 में 92,695, 2022-23 में 92,441, 2023-24 में 92,439, 2024-25 में 92,250 और 2025-26 में घटकर 89,824 रह गई।
इस प्रकार 2019-20 की तुलना में 2025-26 तक प्रदेश में करीब 9,600 सरकारी स्कूल कम हो चुके हैं।
यदि अगले पांच वर्षों में करीब सात हजार और स्कूल बंद या मर्ज होते हैं तो यह संख्या और तेजी से घट सकती है।
यह आंकड़ा केवल प्रशासनिक पुनर्गठन का संकेत नहीं है। इसके पीछे प्रदेश के ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों में शिक्षा की पहुंच का प्रश्न भी जुड़ा हुआ है।
गुणवत्ता बढ़ेगी, लेकिन पहुंच का क्या होगा?
सरकार का उद्देश्य निश्चित रूप से सरकारी शिक्षा की गुणवत्ता सुधारना है। यदि बड़े विद्यालयों में पर्याप्त शिक्षक, आधुनिक प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय, डिजिटल सुविधाएं और खेल संसाधन उपलब्ध होते हैं तो विद्यार्थियों को इसका लाभ मिल सकता है।लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष उसकी पहुंच है।
किसी गांव का स्कूल बंद होकर दूसरे गांव या कस्बे में चला जाता है तो विद्यार्थी को वहां पहुंचने के लिए परिवहन की जरूरत होगी। यदि बस समय पर नहीं आती, खराब मौसम में रास्ता बंद होता है या परिवहन व्यवस्था किसी कारण से प्रभावित होती है, तो बच्चे की नियमित उपस्थिति पर असर पड़ सकता है।विशेषकर छोटी कक्षाओं के विद्यार्थियों के लिए यह समस्या और गंभीर हो सकती है।इसलिए स्कूल मर्ज करने के साथ परिवहन व्यवस्था को केवल सहायक सुविधा नहीं, बल्कि शिक्षा की अनिवार्य व्यवस्था के रूप में देखना होगा।
कम छात्र संख्या का कारण भी तलाशना जरूरी
यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि आखिर सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या कम क्यों हो रही है?क्या गांवों से पलायन इसका कारण है?क्या परिवारों की आर्थिक स्थिति बदलने से बच्चों के स्कूल छोड़ने की स्थिति बन रही है?क्या अभिभावक निजी स्कूलों को बेहतर मानकर वहां बच्चों को भेज रहे हैं?क्या सरकारी स्कूलों में शिक्षक, विषय विशेषज्ञ और आधुनिक सुविधाओं की कमी इसकी वजह है?क्या अंग्रेजी माध्यम और निजी स्कूलों के बढ़ते आकर्षण का प्रभाव सरकारी स्कूलों पर पड़ रहा है?यदि कम छात्र संख्या का मूल कारण समझे बिना केवल स्कूल को बंद या मर्ज कर दिया गया तो समस्या का एक हिस्सा हल हो सकता है, लेकिन सरकारी शिक्षा से जुड़ी मूल चुनौती बनी रह सकती है।जरूरत इस बात की है कि सरकार कम छात्र संख्या को समस्या मानने के साथ-साथ उसके कारण को भी समस्या के रूप में देखे।
बढ़ा शिक्षा बजट, फिर भी सरकारी स्कूलों में बच्चों को रोकना चुनौती
मध्य प्रदेश में स्कूल शिक्षा का बजट भी लगातार बढ़ा है। दो वर्षों में करीब 9 हजार करोड़ रुपये की वृद्धि के बाद यह लगभग 36,730 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।बढ़ता बजट बताता है कि शिक्षा पर सरकार का खर्च बढ़ रहा है। लेकिन असली सवाल यह है कि इस खर्च का प्रभाव कक्षा के अंदर कितना दिखाई देता है।क्या बच्चों की सीखने की क्षमता बेहतर हो रही है?क्या सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या बढ़ रही है?क्या अभिभावकों का भरोसा बढ़ रहा है?क्या शिक्षकों की उपलब्धता और गुणवत्ता में सुधार हो रहा है?
केवल भवन और अधोसंरचना पर निवेश से सरकारी शिक्षा व्यवस्था मजबूत नहीं होगी। इसके साथ शिक्षक, पाठ्यक्रम, तकनीक, नियमित उपस्थिति, सीखने के परिणाम और अभिभावकों के विश्वास पर भी समान ध्यान देना होगा।
शिक्षकों के बेहतर उपयोग का तर्क
सरकार का एक महत्वपूर्ण तर्क यह है कि कम छात्र संख्या वाले स्कूलों में उपलब्ध शिक्षक और संसाधन अपेक्षाकृत अधिक हैं। इन स्कूलों को मर्ज करने के बाद शिक्षकों को उन स्कूलों में भेजा जा सकता है जहां उनकी अधिक आवश्यकता है।लोक शिक्षण आयुक्त अभिषेक सिंह के अनुसार सांदीपनि विद्यालयों में आसपास के स्कूलों के बच्चों को प्रवेश दिया जा रहा है और उन्हें स्कूल तक पहुंचाने के लिए बस सुविधा भी दी जा रही है। कम छात्र संख्या वाले स्कूलों को पास के स्कूलों में मर्ज करने से शिक्षकों के बेहतर उपयोग की बात कही गई है।संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल की दृष्टि से यह तर्क महत्वपूर्ण है। लेकिन शिक्षा व्यवस्था का मूल्यांकन केवल शिक्षक और विद्यार्थी की संख्या से नहीं किया जा सकता।
स्कूल गांव के सामाजिक जीवन का भी हिस्सा होता है।
कई गांवों में स्कूल बच्चों की शिक्षा के साथ-साथ समुदाय और सरकारी व्यवस्था के बीच महत्वपूर्ण संपर्क केंद्र होता है। इसलिए स्कूल बंद करने या मर्ज करने का निर्णय स्थानीय परिस्थितियों को समझकर लिया जाना चाहिए।
ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में सबसे बड़ी परीक्षा
सांदीपनि विद्यालय मॉडल की वास्तविक परीक्षा प्रदेश के ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों में होगी।शहरों के आसपास बड़े विद्यालयों तक पहुंच अपेक्षाकृत आसान हो सकती है, लेकिन जंगल, पहाड़ी, नदी-नालों और खराब सड़क वाले क्षेत्रों में बच्चों को रोज बड़े स्कूल तक पहुंचाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।आदिवासी और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों के लिए यह चुनौती और बड़ी हो सकती है।विशेषकर बालिकाओं की शिक्षा के संदर्भ में सुरक्षित परिवहन महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि स्कूल की दूरी बढ़ती है और परिवहन व्यवस्था भरोसेमंद नहीं रहती तो कुछ परिवार बेटियों को दूर स्कूल भेजने से बच सकते हैं।इसलिए स्कूलों के विलय के साथ यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई बच्चा केवल दूरी के कारण शिक्षा से वंचित न हो।
क्या हर छोटे स्कूल को मर्ज करना जरूरी है?
कम छात्र संख्या वाले हर स्कूल को बंद करना ही एकमात्र समाधान हो, यह जरूरी नहीं है।जहां भौगोलिक स्थिति कठिन है, वहां छोटे स्कूलों को बेहतर डिजिटल कनेक्टिविटी, साझा शिक्षकों, क्लस्टर मॉडल, मोबाइल विषय विशेषज्ञ टीम और नियमित शैक्षणिक सहयोग से मजबूत किया जा सकता है।वहीं जिन क्षेत्रों में दो स्कूल बहुत पास हैं और विद्यार्थियों की संख्या बेहद कम है, वहां विलय से संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव है।इसलिए नीति का आधार केवल यह नहीं होना चाहिए कि ‘स्कूल में बच्चे कम हैं‘, बल्कि यह होना चाहिए कि ‘इन बच्चों को सबसे बेहतर और सबसे सुगम तरीके से शिक्षा कैसे दी जा सकती है।‘
सीएम राइज से सांदीपनि तक—अब अनुभव से सीखने का समय
सीएम राइज स्कूलों ने बड़े और सर्वसुविधायुक्त सरकारी विद्यालयों की अवधारणा को आगे बढ़ाया। अब सांदीपनि विद्यालय उसी सोच को व्यापक स्तर पर ले जाने की कोशिश है।लेकिन इस बदलाव का मूल्यांकन केवल नए विद्यालयों की संख्या या उन पर खर्च होने वाली राशि से नहीं होना चाहिए।
यह देखना होगा कि—क्या सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या बढ़ती है?क्या सीखने के परिणाम बेहतर होते हैं?क्या शिक्षकों का उपयोग अधिक प्रभावी होता है?क्या अभिभावकों का सरकारी शिक्षा पर भरोसा बढ़ता है?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या गांव और बस्ती का बच्चा भी उतनी ही आसानी से स्कूल पहुंच पाता है जितना पहले पहुंचता था?यही सवाल सीएम राइज से सांदीपनि विद्यालय तक के पूरे सफर की सफलता तय करेंगे।
सरकार के सामने तीन बड़ी चुनौतियां—गुणवत्ता, पहुंच और समानताआने वाले वर्षों में मध्य प्रदेश सरकार के सामने शिक्षा के क्षेत्र में तीन बड़ी चुनौतियां दिखाई देती हैं।पहली चुनौती है गुणवत्ता—सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को बेहतर और आधुनिक शिक्षा देना।दूसरी चुनौती है पहुंच—स्कूल चाहे कितना भी आधुनिक क्यों न हो, यदि बच्चा वहां नियमित रूप से पहुंच नहीं पा रहा तो उसका लाभ सीमित रह जाएगा।तीसरी चुनौती है समानता—शहर और गांव, सामान्य क्षेत्र और आदिवासी क्षेत्र, संपन्न और कमजोर परिवार के बच्चों को शिक्षा के समान अवसर उपलब्ध कराना।सांदीपनि विद्यालयों का मॉडल तभी सफल माना जाएगा जब इन तीनों चुनौतियों का समाधान एक साथ किया जा सके।
आगे की राह—बड़े स्कूलों के साथ छोटे गांवों की चिंता भी जरूरी
सरकार यदि बड़े विद्यालयों का नेटवर्क विकसित कर रही है तो उसके साथ छोटे स्कूलों के भविष्य के लिए भी स्पष्ट नीति जरूरी है।स्कूल मर्ज करने से पहले स्थानीय स्तर पर सामाजिक और भौगोलिक सर्वेक्षण किया जाए। केवल दूरी के आधार पर नहीं, बल्कि सड़क, मौसम, परिवहन और विद्यार्थियों की उम्र को ध्यान में रखकर निर्णय लिया जाए।परिवहन व्यवस्था को मजबूत और नियमित बनाया जाए। खासकर छोटे बच्चों और बालिकाओं के लिए सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।कम छात्र संख्या वाले स्कूलों के कारणों का अध्ययन किया जाए। जहां स्कूल की गुणवत्ता सुधारकर विद्यार्थियों की संख्या बढ़ाई जा सकती है, वहां स्कूल को बंद करने के बजाय उसे मजबूत करने का विकल्प अपनाया जाए।वहीं जहां स्कूलों का विलय आवश्यक है, वहां यह सुनिश्चित किया जाए कि शिक्षकों की उपलब्धता, परिवहन और विद्यार्थियों की सुरक्षा में कोई कमी न आए।
निष्कर्ष: बड़ा स्कूल जरूरी है, लेकिन बच्चे तक शिक्षा पहुंचना उससे भी ज्यादा जरूरी
मध्य प्रदेश की सरकारी शिक्षा व्यवस्था आज एक महत्वपूर्ण परिवर्तन के दौर में है। सीएम राइज स्कूलों से शुरू हुई बड़े और सर्वसुविधायुक्त विद्यालयों की सोच अब सांदीपनि विद्यालयों के रूप में बड़े स्तर पर आगे बढ़ रही है।सरकार का यह प्रयास सरकारी शिक्षा में गुणवत्ता, संसाधन और आधुनिक सुविधाओं को बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। लेकिन इसके साथ छोटे सरकारी स्कूलों की घटती संख्या और अगले पांच वर्षों में संभावित बड़े पैमाने पर विलय को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
स्कूल छोटा हो सकता है, लेकिन उसमें पढ़ने वाले बच्चे का भविष्य छोटा नहीं होता।
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए बड़े विद्यालय जरूरी हो सकते हैं, लेकिन शिक्षा की पहली शर्त यह है कि बच्चा स्कूल तक पहुंच सके।इसलिए मध्य प्रदेश की शिक्षा नीति की असली सफलता इस बात में होगी कि सांदीपनि विद्यालयों की चमक के साथ गांवों और बस्तियों के बच्चों की पहुंच भी सुरक्षित रहे।आने वाले वर्षों में प्रदेश के सामने चुनौती केवल हजारों करोड़ रुपये खर्च कर नए और बड़े स्कूल खड़े करने की नहीं होगी। असली चुनौती यह होगी कि इन बड़े स्कूलों तक पहुंचने वाला हर बच्चा नियमित रूप से पढ़ सके, शिक्षक उपलब्ध हों, सीखने का स्तर बेहतर हो और कोई बच्चा केवल दूरी, परिवहन या आर्थिक-सामाजिक परिस्थितियों के कारण शिक्षा से बाहर न हो।सीएम राइज से सांदीपनि तक का यह सफर तभी सफल माना जाएगा, जब बड़े स्कूलों के निर्माण के साथ सरकारी शिक्षा का भरोसा भी बड़ा हो—और प्रदेश का कोई बच्चा पीछे न छूटे।
