कलेक्टर के निर्देश पर शुरू हुआ अभियान, आंकड़ों में दिख रही कार्रवाई; लेकिन दमोह की सड़कों पर अब भी बड़ी संख्या में गोवंश—नगर पालिका की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवाल
दमोह। भगवान बलराम जयंती के अवसर पर दमोह कलेक्टर प्रताप नारायण यादव द्वारा जिले में शुरू किया गया “सड़क से गौशाला की ओर” अभियान अब चर्चा का विषय बनता जा रहा है। अभियान का उद्देश्य सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर विचरण करने वाले गोवंश को सुरक्षित रूप से गौशालाओं तक पहुंचाना और सड़क दुर्घटनाओं की संभावनाओं को कम करना है।कलेक्टर के निर्देश के बाद जिले के संबंधित अधिकारियों को जिम्मेदारियां सौंपी गईं और अभियान के लिए समय-सीमा भी निर्धारित की गई। अधिकारियों द्वारा प्रतिदिन सड़क से हटाकर गौशाला पहुंचाए गए गोवंश के आंकड़े भी प्रस्तुत किए जा रहे हैं। इससे यह संकेत मिल रहा है कि अभियान के स्तर पर कार्रवाई की जा रही है।
लेकिन दमोह नगर की जमीनी तस्वीर इन दावों से कुछ अलग नजर आ रही है। शहर के कई प्रमुख मार्गों और सार्वजनिक स्थानों पर अभी भी बड़ी संख्या में गोवंश सड़कों पर विचरण करता दिखाई दे रहा है।सिटी कोतवाली, भारतीय जनता पार्टी कार्यालय और पुरातत्व संग्रहालय के मध्य स्थित कीर्ति स्तंभ क्षेत्र में भी सड़क पर गोवंश दिखाई देने की स्थिति सामने आ रही है। वहीं हरिजन थाना के सामने और चाट-चौपाटी क्षेत्र में भी बड़ी संख्या में गोवंश सड़कों पर बैठा अथवा विचरण करता नजर आता है।
यातायात में बाधा और दुर्घटना का खतरा
सड़कों पर बैठे या अचानक वाहनों के सामने आ जाने वाले गोवंश के कारण वाहन चालकों को कई बार अचानक ब्रेक लगाना पड़ता है। इससे यातायात प्रभावित होने के साथ-साथ दुर्घटना की आशंका भी बनी रहती है। खासकर रात के समय सड़क पर बैठे पशु वाहन चालकों के लिए गंभीर खतरा बन सकते हैं।ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब अभियान के तहत जिलेभर में गोवंश को सड़कों से हटाकर गौशालाओं तक पहुंचाने के निर्देश दिए गए हैं, तो दमोह नगर के प्रमुख और व्यस्त मार्गों पर अब भी गोवंश की मौजूदगी क्यों बनी हुई है?
आंकड़ों और जमीनी हकीकत में कितना अंतर?
अभियान के तहत प्रतिदिन कितने गोवंश को सड़कों से हटाकर गौशालाओं तक पहुंचाया गया, इसके आंकड़े सामने रखे जा रहे हैं। लेकिन दूसरी ओर शहर की सड़कों पर दिखाई दे रहा गोवंश यह सवाल खड़ा कर रहा है कि अभियान का वास्तविक असर धरातल पर कितना हुआ है।आम नागरिकों के बीच भी इसको लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हैं। लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या केवल आंकड़ों के आधार पर अभियान की सफलता तय की जाएगी या शहर की सड़कों पर दिखाई देने वाली स्थिति भी इसकी सफलता का पैमाना बनेगी?
नगर पालिका की जिम्मेदारी पर भी सवाल
कलेक्टर प्रताप नारायण यादव ने अभियान को लेकर संबंधित अधिकारियों को स्पष्ट जिम्मेदारी दी है। ऐसे में दमोह नगर पालिका के जिम्मेदार अधिकारियों और अमले की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि शहर के प्रमुख मार्गों पर लगातार गोवंश दिखाई दे रहा है, तो यह जानना जरूरी है कि गोवंश को पकड़कर गौशालाओं तक पहुंचाने की व्यवस्था कितनी प्रभावी है और अभियान की नियमित निगरानी किस स्तर पर हो रही है।यह भी सवाल उठ रहा है कि अभियान के दौरान गौशालाओं तक पहुंचाए गए गोवंश की निगरानी और दोबारा सड़कों पर उनके आने की स्थिति को रोकने के लिए क्या व्यवस्था की गई है।
अभियान की सफलता का असली पैमाना क्या होगा?
“सड़क से गौशाला की ओर” अभियान निश्चित रूप से गोवंश की सुरक्षा, यातायात व्यवस्था और सड़क दुर्घटनाओं की रोकथाम की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। लेकिन अभियान की वास्तविक सफलता तभी मानी जाएगी, जब दमोह शहर की प्रमुख सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर आवारा गोवंश की समस्या स्थायी रूप से कम दिखाई दे।फिलहाल एक ओर कार्रवाई के आंकड़े सामने आ रहे हैं, तो दूसरी ओर शहर की सड़कों पर गोवंश की मौजूदगी प्रशासनिक दावों और जमीनी हकीकत के बीच अंतर का सवाल खड़ा कर रही है।अब देखना यह होगा कि कलेक्टर के निर्देश के बाद नगर पालिका और संबंधित विभाग इस अभियान को कितनी गंभीरता से आगे बढ़ाते हैं और आने वाले दिनों में दमोह की सड़कों पर गोवंश की स्थिति में कितना बदलाव दिखाई देता है।
