पॉक्सो विशेष न्यायालय का फैसला, 2,500 रुपये अर्थदंड; पीड़िता के पुनर्वास के लिए 50 हजार रुपये की अनुशंसा
इंदौर, 20 अगस्त 2026। नाबालिग बच्चियों की सुरक्षा और उनके सम्मान से जुड़े मामलों में कानून की गंभीरता एक बार फिर सामने आई है। इंदौर के एरोड्रम थाना क्षेत्र से जुड़े एक मामले में विशेष पॉक्सो न्यायालय ने 14 वर्ष 5 माह की बालिका का पीछा कर उसे परेशान करने के आरोप में दोषी पाए गए 24 वर्षीय आरोपी कालू जगताप को 3 वर्ष के सश्रम कारावास और कुल 2,500 रुपये के अर्थदंड से दंडित किया है।
यह फैसला इंदौर के 21वें अपर सत्र न्यायाधीश एवं विशेष न्यायालय द्वारा विशेष प्रकरण क्रमांक 271/2025 में सुनाया गया। शासन की ओर से मामले में विशेष लोक अभियोजक सुश्री ज्योति आर्य ने पैरवी की।अभियोजन के अनुसार, बालिका कक्षा छठवीं की छात्रा थी। उसके पिता फल का ठेला लगाते थे और उनके ठेले के पास आरोपी भी फल का ठेला लगाता था। बालिका आरोपी को परिचित होने के कारण ‘भैया’ कहकर संबोधित करती थी।
10 मार्च 2025 को दोपहर करीब 1 बजे स्कूल की छुट्टी के बाद बालिका पैदल अपने घर जा रही थी। आरोप है कि स्कूल से कुछ दूरी पर आरोपी उसका पीछा करने लगा और उसे रुककर बात करने के लिए आवाज दी। इससे भयभीत होकर बालिका तेजी से अपने घर की ओर जाने लगी, लेकिन आरोपी द्वारा उसका पीछा किए जाने का आरोप है।घटना के बाद बालिका ने अपने माता-पिता के साथ एरोड्रम थाने पहुंचकर घटना की जानकारी दी। पुलिस ने प्रकरण में भारतीय न्याय संहिता की धारा 78 तथा पॉक्सो अधिनियम की धारा 11/12 के तहत मामला दर्ज कर विवेचना शुरू की। पुलिस ने घटनास्थल का नक्शा तैयार करने के साथ बालिका और उसके माता-पिता सहित संबंधित गवाहों के बयान दर्ज किए तथा विवेचना पूरी होने के बाद अभियोग-पत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया।
सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से छह साक्षियों के बयान न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए गए। उपलब्ध साक्ष्यों और अभियोजन के पक्ष से प्रस्तुत सामग्री के आधार पर न्यायालय ने आरोपी को दोषी मानते हुए पॉक्सो अधिनियम की धारा 11(iv)/12 के तहत 3 वर्ष के सश्रम कारावास एवं अर्थदंड की सजा सुनाई।
पीड़िता के लिए 50 हजार रुपये की अनुशंसा
मामले में न्यायालय ने पीड़िता को हुई शारीरिक एवं मानसिक क्षति को ध्यान में रखते हुए पीड़ित प्रतिकर योजना के अंतर्गत 50 हजार रुपये की राशि प्रदान किए जाने की अनुशंसा भी की है।
संदेश साफ—बच्चों की सुरक्षा में लापरवाही नहीं
यह मामला समाज के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि बच्चों के साथ किसी भी प्रकार का अनुचित व्यवहार, पीछा करना या लैंगिक उत्पीड़न कानून की नजर में गंभीर अपराध है। विशेष रूप से नाबालिग बच्चों को असहज या भयभीत करने वाले व्यवहार को नजरअंदाज करने के बजाय अभिभावकों और परिजनों को तत्काल संबंधित पुलिस अथवा सक्षम प्राधिकरण को सूचना देनी चाहिए।साथ ही, नाबालिग पीड़िता की पहचान और उससे संबंधित व्यक्तिगत विवरण को सार्वजनिक न करना कानून और संवेदनशील पत्रकारिता दोनों की दृष्टि से आवश्यक है। न्यायालय के फैसले में भी बाल संरक्षण कानूनों की मंशा स्पष्ट रूप से दिखाई देती है कि बच्चों की गरिमा, सुरक्षा और मानसिक हित सर्वोच्च प्राथमिकता हैं।
