पथरिया की जनता क्यों पहुंचती रही दमोह? दो-दो आवास, दमोह से जनसुनवाई और अब विभाग परिवर्तन… क्या यह सिर्फ संयोग है या कोई बड़ा राजनीतिक संदेश?
(डॉ.एल.एन.वैष्णव)
मध्य प्रदेश की राजनीति में मंगलवार की देर रात ऐसा प्रशासनिक फैसला सामने आया, जिसने सत्ता के गलियारों से लेकर गांव-गांव तक नई बहस छेड़ दी। राजपत्र अधिसूचना जारी हुई और एक झटके में मंत्री लखन पटेल से पशुपालन एवं डेयरी विभाग वापस ले लिया गया। उनकी जिम्मेदारी अब केवल आनंद विभाग तक सीमित रह गई, जबकि पशुपालन विभाग सीधे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने अपने पास रख लिया।
सरकार ने विभाग परिवर्तन का आदेश तो जारी कर दिया, लेकिन यह नहीं बताया कि आखिर ऐसी क्या परिस्थितियां बनीं कि एक मंत्री से इतना महत्वपूर्ण विभाग वापस लेना पड़ा। यही चुप्पी अब सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल बन गई है।
क्या यह सामान्य फेरबदल है या राजनीतिक संदेश?
सरकारें समय-समय पर विभाग बदलती हैं। यह सामान्य प्रक्रिया भी हो सकती है। लेकिन जब किसी मंत्री से महत्वपूर्ण विभाग वापस लेकर मुख्यमंत्री स्वयं उसे संभाल लें, तो राजनीतिक विश्लेषक स्वाभाविक रूप से उसके पीछे के कारणों पर चर्चा करते हैं।
बीते कुछ महीनों में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मंत्रियों के कामकाज की समीक्षा की थी। बताया गया कि विभागवार प्रगति, शिकायतें और योजनाओं के क्रियान्वयन की समीक्षा की गई। हालांकि सरकार ने यह नहीं कहा कि विभाग परिवर्तन उसी समीक्षा का परिणाम है, लेकिन समय और घटनाक्रम को जोड़कर राजनीतिक हलकों में कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं।
NDDB और गौशाला योजना की चर्चाएं
राजनीतिक और मीडिया सूत्रों में चर्चा रही कि नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड (NDDB) के साथ समन्वय, दुग्ध संघ के संचालन और स्वावलंबी गौशाला योजना के कुछ पहलुओं को लेकर असंतोष की बातें सामने आई थीं। कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि शिकायतें उच्च स्तर तक पहुंचीं। इन दावों पर सरकार की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है, लेकिन विभाग परिवर्तन के बाद इन चर्चाओं ने फिर जोर पकड़ लिया है।
दमोह में वर्षों से उठता रहा एक सवाल…
भोपाल की राजनीति अपनी जगह है, लेकिन दमोह जिले में चर्चा का विषय कुछ और भी रहा है।
लखन पटेल पथरिया विधानसभा से विधायक हैं। सामान्यतः जनता अपेक्षा करती है कि उसका विधायक और मंत्री अधिकतर समय अपने विधानसभा क्षेत्र में जनसुनवाई करे, लोगों की समस्याएं सुने और वहीं से कामकाज संचालित करे।
लेकिन लंबे समय से स्थानीय स्तर पर यह चर्चा रही कि मंत्री की जनसुनवाई और मुलाकातें पथरिया के बजाय दमोह शहर में अधिक होती रहीं। ऐसे में पथरिया क्षेत्र के लोगों को अपनी समस्याएं लेकर दमोह आना पड़ता था।
ग्रामीणों और स्थानीय राजनीतिक हलकों में बार-बार यह सवाल सुनाई देता रहा—
“जब विधायक पथरिया के हैं, तो जनता को दमोह क्यों आना पड़ता है?”
क्या पथरिया केवल चुनाव तक सीमित रह गई?
यह सवाल भी समय-समय पर उठता रहा कि क्या विधानसभा की जनता को अपने ही विधायक से मिलने के लिए दूसरी विधानसभा में जाना उचित व्यवस्था है?
स्थानीय लोगों का कहना रहा कि जनसुनवाई यदि पथरिया में नियमित होती, तो ग्रामीणों को बार-बार दमोह का सफर नहीं करना पड़ता।
हालांकि मंत्री समर्थकों का कहना है कि दमोह जिला मुख्यालय होने के कारण अधिकारियों से समन्वय और प्रशासनिक कार्यों की सुविधा वहीं उपलब्ध रहती है।
दो-दो आवास भी बने चर्चा का विषय
राजधानी भोपाल में मंत्री का शासकीय आवास होना स्वाभाविक है।
लेकिन दमोह शहर में जटाशंकर स्थित शासकीय बंगला और पलंदी चौराहा स्थित निजी निवास दोनों लंबे समय तक राजनीतिक गतिविधियों के केंद्र रहे।
स्थानीय चर्चाओं में अक्सर यह सवाल भी उठता रहा कि क्या प्रदेश में ऐसे उदाहरण बहुत कम हैं, जहां किसी मंत्री की सक्रियता राजधानी के साथ-साथ गृह जिले के शासकीय आवास से भी लगातार संचालित होती हो?
विभाग गया, सवाल बढ़ गए
पशुपालन विभाग हटने के बाद अब मंत्री के पास केवल आनंद विभाग है।
यहीं से सोशल मीडिया पर व्यंग्य और राजनीतिक टिप्पणियों का दौर शुरू हो गया।
कहीं लिखा गया—
“अब जिम्मेदारी पशुपालन की नहीं, आनंद की है।”
तो कहीं लिखा गया—
“अब ताली बजाइए, मुस्कुराइए और आनंद मनाइए।”
ये सोशल मीडिया और जनचर्चा की प्रतिक्रियाएं हैं। सरकार ने इस पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है।
मुख्यमंत्री ने खुद क्यों संभाला विभाग?
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि किसी विभाग का काम संतोषजनक चल रहा हो, तो सामान्यतः उसका प्रभार उसी मंत्री के पास रहता है।
ऐसे में मुख्यमंत्री द्वारा स्वयं विभाग संभालने के फैसले ने स्वाभाविक रूप से कई सवाल पैदा किए हैं।
- क्या सरकार विभाग की गति तेज करना चाहती है?
- क्या विभागीय कामकाज पर असंतोष था?
- क्या आने वाले समय में और बड़े प्रशासनिक फैसले देखने को मिलेंगे?
- क्या यह केवल शुरुआत है?
इन सवालों के जवाब फिलहाल सरकार ने नहीं दिए हैं।
दमोह की राजनीति में क्या बदलेगा?
अब सबसे बड़ी नजर इस बात पर होगी कि विभाग परिवर्तन के बाद मंत्री लखन पटेल अपनी विधानसभा में कितनी सक्रियता बढ़ाते हैं।
क्या पथरिया में नियमित जनसुनवाई होगी?
क्या जनता को अब भी दमोह आना पड़ेगा?
क्या मंत्री अपनी राजनीतिक शैली में बदलाव करेंगे?
या फिर सब कुछ पहले जैसा ही चलता रहेगा?
अंतिम सवाल…
राजनीति में विभाग केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं होते, वे सरकार के विश्वास और प्राथमिकताओं का भी संकेत माने जाते हैं।
ऐसे में जब किसी मंत्री से बड़ा विभाग वापस लेकर केवल एक विभाग छोड़ दिया जाए, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
क्या यह केवल विभागीय फेरबदल है?
या सरकार ने अपने ही मंत्रियों को प्रदर्शन का संदेश दिया है?
या फिर इसके पीछे कोई और राजनीतिक रणनीति है?
इन सवालों के जवाब आने वाला समय देगा, लेकिन इतना तय है कि “पशुपालन से आनंद तक” का यह सफर मध्य प्रदेश की राजनीति का सबसे चर्चित घटनाक्रम बन चुका है।
