महिला बाल विकास विभाग में रिश्वतखोरी पर सख्त प्रहार, 6 हजार की मांग और 4 हजार लेते रंगे हाथ पकड़ी गई थी अधिकारी

दमोह, 29 अप्रैल 2026 (बुधवार)दमोह जिले में भ्रष्टाचार के एक चर्चित मामले में बुधवार को दमोह न्यायालय ने बड़ा और सख्त फैसला सुनाते हुए महिला एवं बाल विकास विभाग की तत्कालीन प्रभारी परियोजना अधिकारी श्वेता सिंह ठाकुर को रिश्वत लेने का दोषी करार दिया। विशेष न्यायाधीश (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम) संतोष कुमार गुप्ता की अदालत ने आरोपी अधिकारी को 04 वर्ष के सश्रम कारावास तथा ₹2000 के अर्थदंड से दंडित किया है। वहीं मामले में सहआरोपी बनाए गए उसके पति अनूप जैन को न्यायालय ने संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त (बरी) कर दिया।यह फैसला न केवल महिला एवं बाल विकास विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार पर करारा प्रहार माना जा रहा है, बल्कि लोकायुक्त की ट्रैप कार्रवाई को न्यायिक मुहर भी मिल गई है।
नोटिस दबाने के एवज में मांगी थी रिश्वत, पीड़िता पहुंची लोकायुक्त के पास
अभियोजन के अनुसार मामला वर्ष 2019 का है।22 दिसंबर 2019 को ग्राम घुटरिया, तहसील तेंदूखेड़ा निवासी श्रीमती भानुकुमारी ने लोकायुक्त कार्यालय सागर पहुंचकर लिखित शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में बताया गया कि महिला एवं बाल विकास विभाग में उनके विरुद्ध जारी एक विभागीय नोटिस पर कार्रवाई रोकने और मामले को शांत करने के एवज में तत्कालीन प्रभारी परियोजना अधिकारी श्वेता सिंह ठाकुर द्वारा ₹6000 रिश्वत की मांग की जा रही है।शिकायत गंभीर होने पर लोकायुक्त पुलिस ने तत्काल इसकी गोपनीय जांच प्रारंभ की।
डिजिटल रिकॉर्डर से हुई रिश्वत मांग की पुष्टि
लोकायुक्त टीम ने शिकायत की सत्यता जांचने के लिए फरियादिया भानुकुमारी को एक डिजिटल वॉयस रिकॉर्डर उपलब्ध कराया।23 दिसंबर 2019 को फरियादिया तेंदूखेड़ा स्थित आरोपी अधिकारी के किराए के मकान पर पहुंची, जहां दोनों के बीच हुई बातचीत रिकॉर्ड की गई।रिकॉर्डिंग की जांच में यह स्पष्ट पाया गया कि श्वेता सिंह ठाकुर नोटिस संबंधी कार्रवाई न करने के बदले रिश्वत राशि मांग रही थीं। इसके बाद लोकायुक्त ने ट्रैप की पूरी रणनीति तैयार की।
26 दिसंबर 2019: 4 हजार रुपए लेते रंगे हाथ दबोची गई अधिकारी
निर्धारित योजना के अनुसार 26 दिसंबर 2019 को फरियादिया को केमिकल लगे नोट देकर आरोपी के पास भेजा गया।जैसे ही फरियादिया ने रिश्वत की तय किस्त ₹4000 श्वेता सिंह ठाकुर को सौंपी, पहले से तैनात लोकायुक्त टीम ने मौके पर दबिश देकर आरोपी अधिकारी को रंगे हाथ पकड़ लिया।कार्रवाई के दौरान आरोपी के हाथ धुलवाए गए तो सोडियम कार्बोनेट घोल गुलाबी हो गया, वहीं आरोपी की बनियान भी परीक्षण में गुलाबी पाई गई। यह वैज्ञानिक साक्ष्य रिश्वत की रकम स्वीकार किए जाने का प्रत्यक्ष प्रमाण बना।लोकायुक्त ने मौके से रिश्वत राशि बरामद कर पंचनामा तैयार किया और प्रकरण दर्ज कर विवेचना शुरू की।
न्यायालय में दस्तावेज, गवाह और वैज्ञानिक परीक्षण बने निर्णायक
विवेचना पूर्ण होने के बाद लोकायुक्त द्वारा विशेष न्यायालय दमोह में अभियोग पत्र प्रस्तुत किया गया। सुनवाई के दौरान अभियोजन ने रिश्वत मांग की ऑडियो रिकॉर्डिंग, ट्रैप पंचनामा, रासायनिक परीक्षण रिपोर्ट, स्वतंत्र गवाहों के बयान तथा फरियादिया की गवाही न्यायालय के समक्ष पेश की।विशेष न्यायाधीश संतोष कुमार गुप्ता ने उपलब्ध दस्तावेजी साक्ष्य, मौखिक गवाहियों और वैज्ञानिक परीक्षणों का परीक्षण करने के बाद माना कि आरोपी श्वेता सिंह ठाकुर के विरुद्ध रिश्वत मांगने और रिश्वत स्वीकार करने का आरोप संदेह से परे सिद्ध होता है।इसी आधार पर न्यायालय ने उन्हें भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की प्रासंगिक धाराओं में दोषी ठहराते हुए:
- 04 वर्ष का सश्रम कारावास
- ₹2000 का अर्थदंड
से दंडित किया।
पति अनूप जैन को मिला संदेह का लाभ, अदालत ने किया बरी
इसी प्रकरण में आरोपी अधिकारी के पति अनूप जैन को भी सहआरोपी बनाया गया, लेकिन सुनवाई के दौरान उनके विरुद्ध प्रत्यक्ष और ठोस साक्ष्य पर्याप्त रूप से स्थापित नहीं हो सके।न्यायालय ने विधिक सिद्धांतों के अनुसार संदेह का लाभ देते हुए अनूप जैन को दोषमुक्त कर दिया।इस निर्णय से स्पष्ट हुआ कि अदालत ने जहां दोष सिद्ध होने पर महिला बाल विकास की परियोजना अधिकारी के खिलाफ कठोर रुख अपनाया, वहीं साक्ष्य के अभाव में सहआरोपी को राहत भी प्रदान की।
अभियोजन की ओर से संजय कुमार रावत ने की प्रभावी पैरवी

प्रकरण में अभियोजन पक्ष की ओर से प्रभारी उप संचालक अभियोजन धर्मेंद्र सिंह तारन के निर्देशन में सहायक जिला अभियोजन अधिकारी संजय कुमार रावत ने न्यायालय में प्रभावी पैरवी की। इस दौरान सहायक ग्रेड-3 विनय नामदेव का भी महत्वपूर्ण सहयोग रहा।अभियोजन की मजबूत प्रस्तुति और लोकायुक्त द्वारा जुटाए गए तकनीकी एवं वैज्ञानिक साक्ष्यों ने मामले को निर्णायक मोड़ तक पहुंचाया।
भ्रष्टाचारियों के लिए कड़ा संदेश
दमोह न्यायालय के इस फैसले को जिले में सरकारी तंत्र के भीतर रिश्वतखोरी पर बड़ी न्यायिक चोट माना जा रहा है।महिला एवं बाल विकास जैसे संवेदनशील विभाग में पदस्थ अधिकारी द्वारा रिश्वत मांगना न केवल विभागीय मर्यादा पर प्रश्न था बल्कि आमजन के विश्वास के साथ छल भी था। ऐसे में अदालत का यह फैसला भ्रष्टाचार के विरुद्ध स्पष्ट संदेश देता है कि रिश्वतखोरी अब केवल ट्रैप तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि दोष सिद्ध होने पर जेल की सलाखों तक पहुंचाएगी।
