निर्माण कार्यों के बिलों के भुगतान की अनुशंसा के एवज में 50 हजार रुपये रिश्वत लेने का मामला, लोकायुक्त की ट्रैप कार्रवाई के बाद हुई थी गिरफ्तारी

दमोह। आज 30 सितंबर 2026 बुधवार को दमोह न्यायालय में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम से जुड़े एक मामले में विशेष न्यायाधीश भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, दमोह संतोष कुमार गुप्ता ने तत्कालीन प्रभारी सहायक यंत्री, जनपद पंचायत दमोह गोविंद दास अहिरवार को दोषसिद्ध पाते हुए चार वर्ष के सश्रम कारावास तथा 5 हजार रुपये के अर्थदंड से दंडित किया। न्यायालय ने आरोपी को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 (संशोधन-2018) की धारा 7 तथा धारा 13(1)(b) सहपठित धारा 13(2) के तहत दोषसिद्ध किया।
अभियोजन के अनुसार यह मामला वर्ष 2021 में सामने आया था। फरियादी लीलेन्द्र सिंह लोधी ने 13 अक्टूबर 2021 को लोकायुक्त पुलिस सागर के समक्ष शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि उनकी माता मूंगाबाई, जो उस समय ग्राम पंचायत बालाकोट की सरपंच थीं, के कार्यकाल के दौरान मनरेगा योजना के अंतर्गत कराए गए विभिन्न निर्माण कार्यों के लंबित देयकों और बिलों के भुगतान की अनुशंसा के लिए तत्कालीन प्रभारी सहायक यंत्री गोविंद दास अहिरवार द्वारा रिश्वत की मांग की जा रही थी।
शिकायत में बताया गया था कि ग्राम पंचायत बालाकोट में मनरेगा योजना के तहत नवीन तालाब, खकरी निर्माण, वृक्षारोपण सहित अन्य निर्माण कार्य कराए गए थे। इन कार्यों से संबंधित लगभग 70 से 80 लाख रुपये के देयकों एवं बिलों के भुगतान की प्रक्रिया चल रही थी। अभियोजन के अनुसार इन बिलों के भुगतान की अनुशंसा करने के एवज में आरोपी द्वारा पांच प्रतिशत के हिसाब से 50 हजार रुपये रिश्वत की मांग की गई थी।
शिकायत के सत्यापन के बाद बनाई गई ट्रैप कार्रवाई की योजना
शिकायत प्राप्त होने के बाद लोकायुक्त पुलिस सागर द्वारा आरोपों का सत्यापन कराया गया। सत्यापन की कार्रवाई के बाद शिकायत में लगाए गए आरोपों के आधार पर आरोपी को रिश्वत लेते हुए पकड़ने के लिए ट्रैप कार्रवाई की योजना तैयार की गई।अभियोजन के अनुसार 1 नवंबर 2021 को लोकायुक्त पुलिस की टीम ने जनपद पंचायत कार्यालय दमोह परिसर में ट्रैप कार्रवाई की। इस दौरान आरोपी गोविंद दास अहिरवार को 50 हजार रुपये की कथित रिश्वत राशि लेते हुए पकड़ा गया। कार्रवाई के दौरान रिश्वत की राशि आरोपी के कब्जे तथा उसकी पेंट की दाहिनी जेब से बरामद किए जाने की बात अभियोजन साक्ष्यों में सामने आई।
ट्रैप कार्रवाई के दौरान रिश्वत की राशि की बरामदगी के साथ आरोपी के हाथों और कपड़ों की रासायनिक जांच भी की गई। अभियोजन के अनुसार केमिकल परीक्षण के दौरान तैयार किए गए घोल का रंग गुलाबी पाया गया। इन परीक्षणों को भी विवेचना के दौरान साक्ष्य के रूप में अभिलेख पर लिया गया।
भौतिक और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के साथ एफएसएल रिपोर्ट भी पेश
लोकायुक्त पुलिस द्वारा मामले की विवेचना के दौरान विभिन्न प्रकार के साक्ष्य संकलित किए गए। इसमें भौतिक एवं दस्तावेजी साक्ष्यों के साथ मौखिक और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य भी शामिल किए गए। इसके अलावा फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी यानी एफएसएल से प्राप्त रासायनिक एवं ध्वनि परीक्षण संबंधी रिपोर्ट को भी विवेचना का हिस्सा बनाया गया।विवेचना पूरी होने के बाद उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपी गोविंद दास अहिरवार के विरुद्ध अभियोग पत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया गया। न्यायालय में विचारण के दौरान अभियोजन की ओर से प्रस्तुत दस्तावेजी एवं मौखिक साक्ष्यों के साथ अन्य उपलब्ध साक्ष्यों पर भी विचार किया गया।
घटना के समय मौके पर नहीं होने का बचाव प्रस्तुत किया
मामले की सुनवाई के दौरान आरोपी की ओर से यह बचाव प्रस्तुत किया गया कि घटना के समय वह संबंधित स्थान पर मौजूद नहीं था। आरोपी द्वारा अपने बचाव में अन्यत्र उपस्थिति यानी ‘Plea of Alibi’ का आधार लेने का प्रयास किया गया।हालांकि अभियोजन द्वारा न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत पंचसाक्षियों की गवाही, नक्शा-मौका, रिश्वत राशि की जब्ती, रासायनिक परीक्षण से संबंधित साक्ष्य तथा विवेचना में संकलित अन्य सामग्री पर न्यायालय ने विचार किया। उपलब्ध साक्ष्यों के परीक्षण के बाद न्यायालय ने आरोपी के इस बचाव को स्वीकार नहीं किया।
न्यायालय ने साक्ष्यों के आधार पर माना दोषसिद्ध
मामले में अभियोजन द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजी और मौखिक साक्ष्यों तथा अभियोजन पक्ष की ओर से प्रस्तुत तर्कों पर विचार करने के बाद विशेष न्यायालय ने आरोपी गोविंद दास अहिरवार को संबंधित धाराओं में दोषसिद्ध पाया।न्यायालय द्वारा आज 30 सितंबर 2026 को पारित निर्णय में आरोपी को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 (संशोधन-2018) की धारा 7 एवं धारा 13(1)(b) सहपठित धारा 13(2) के तहत दोषसिद्ध करते हुए चार वर्ष के सश्रम कारावास तथा 5 हजार रुपये के अर्थदंड से दंडित किया गया।
यह मामला उस समय सामने आया था जब मनरेगा के तहत कराए गए निर्माण कार्यों के बिलों और देयकों के भुगतान की अनुशंसा को लेकर शिकायत लोकायुक्त पुलिस तक पहुंची थी। शिकायत के सत्यापन से लेकर ट्रैप कार्रवाई, रिश्वत राशि की बरामदगी, रासायनिक परीक्षण और बाद की न्यायिक प्रक्रिया के बाद अब न्यायालय ने मामले में अपना निर्णय सुनाया है।
अभियोजन की ओर से की गई पैरवी
मामले में अभियोजन की ओर से प्रभारी उपनिदेशक अभियोजन धर्मेन्द्र सिंह तारन के निर्देशन में सहायक जिला अभियोजन अधिकारी संजय कुमार रावत ने पैरवी की। अभियोजन कार्य में विनय नामदेव द्वारा आवश्यक सहयोग किया गया।न्यायालय के इस निर्णय के साथ वर्ष 2021 में लोकायुक्त की ट्रैप कार्रवाई से शुरू हुए इस प्रकरण में विचारण की न्यायिक प्रक्रिया के बाद आरोपी के विरुद्ध दोषसिद्धि और सजा का आदेश पारित किया गया।
