️इंदौर / मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने शाजापुर कलेक्टर ऋजु बाफना द्वारा पारित दंड आदेश पर सख्त रुख अपनाते हुए उसे अंतरिम रूप से स्थगित कर दिया है। अदालत ने प्रथम दृष्टया माना कि बिना विधिवत विभागीय जांच के किसी कर्मचारी को बड़ी सजा देना सेवा नियमों के विपरीत है। न्यायालय ने मामले को गंभीर मानते हुए कलेक्टर से व्यक्तिगत हलफनामा तलब किया है।न्यायमूर्ति जय कुमार पिल्लई ने 25 मार्च 2026 को पारित आदेश में कलेक्टर को निर्देश दिया कि वे 15 दिनों के भीतर स्पष्ट करें कि बिना आरोप-पत्र, बिना पूर्ण विभागीय जांच और बिना नियमों का पालन किए दंड कैसे दिया गया। कोर्ट ने यह भी कहा कि prima facie यह आदेश अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर पारित किया गया प्रतीत होता है।
30 साल की बेदाग सेवा वाले कर्मचारी ने दी चुनौती
शाजापुर निवासी जयंत बघेरवाल, जो राजस्व विभाग में सहायक ग्रेड-तीन के पद पर तीन दशकों से अधिक समय से कार्यरत हैं, ने अधिवक्ता यश नागर के माध्यम से याचिका दायर की।याचिका में कलेक्टर द्वारा 27 फरवरी 2025 और 28 फरवरी 2025 को पारित आदेशों के साथ ही संभागायुक्त द्वारा 11 दिसंबर 2025 को पारित अपीलीय आदेश को भी चुनौती दी गई थी।हाईकोर्ट ने तीनों आदेशों पर अगली सुनवाई तक रोक लगाते हुए कहा कि मामले में प्रथम दृष्टया प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ है।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी
अदालत ने अपने आदेश में महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं —
- बिना विभागीय जांच बड़ी सजा देना नियम विरुद्ध है
- कलेक्टर ने विवेकाधिकार का सही उपयोग नहीं किया
- अपीलीय प्राधिकारी ने भी त्रुटि को नजरअंदाज किया
- रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री से आरोप सिद्ध नहीं होते
यह है पूरा मामला
मामले के अनुसार दिसंबर 2024 में शाहिद खान नामक ठेकेदार ने बघेरवाल पर रिश्वत लेने का आरोप लगाया था।याचिका में कहा गया कि यह वही ठेकेदार था जिसके विरुद्ध बघेरवाल ने पहले अनियमितताओं को लेकर एफआईआर की सिफारिश की थी और लगभग 85,000 रुपये की वसूली की कार्रवाई भी शुरू कराई थी।शिकायत मिलने के बाद कलेक्टर ने नियम 14 के तहत अनिवार्य आरोप-पत्र जारी किए बिना ही 24 दिसंबर 2024 को केवल कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया। बाद में जांच अधिकारी ने अपनी रिपोर्ट में 35,000 और 15,000 रुपये की कथित रिश्वत के आरोप सिद्ध नहीं पाए।इसके बावजूद कलेक्टर ने 27 फरवरी 2025 को संचयी प्रभाव के साथ दो वेतनवृद्धियां रोकने का आदेश जारी कर दिया, जो सेवा नियमों के अनुसार बड़ी सजा मानी जाती है और जिसके लिए पूर्ण विभागीय जांच आवश्यक होती है।
अगले दिन किया संबद्ध
याचिका में यह भी बताया गया कि दंड आदेश के अगले ही दिन 28 फरवरी 2025 को बघेरवाल को गुलाना एसडीओ कार्यालय में संबद्ध कर दिया गया।आरटीआई के माध्यम से प्राप्त जानकारी में यह भी सामने आया कि शिकायत में जिन वीडियो रिकॉर्डिंग का हवाला दिया गया था, वे आधिकारिक रिकॉर्ड का हिस्सा ही नहीं थीं।
समयमान वेतन का लाभ भी रोका गया
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि 30 वर्ष की सेवा पूर्ण होने पर 18 दिसंबर 2025 को जारी तृतीय समयमान वेतन आदेश में भी बघेरवाल का नाम शामिल नहीं किया गया, जबकि उनसे जूनियर कर्मचारियों को इसका लाभ दे दिया गया।
हाईकोर्ट ने लगाई रोक
इन सभी तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कलेक्टर और संभागायुक्त के आदेशों पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है। साथ ही कलेक्टर से व्यक्तिगत हलफनामा मांगा है। मामले की अगली सुनवाई निर्धारित तिथि पर की जाएगी।
