इंदौर। धोखाधड़ी के एक मामले में पुलिस की लापरवाही सामने आई है, जहां एफआईआर दर्ज होने के बाद भी वर्षों तक कोर्ट में चालान पेश नहीं किया गया। मजबूर होकर फरियादी को न्यायालय की शरण लेनी पड़ी। कोर्ट द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बाद पुलिस हरकत में आई और ताबड़तोड़ जांच पूरी कर चालान पेश कर दिया। इस घटनाक्रम ने पुलिस कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
प्लॉट के सौदे में 21 लाख की धोखाधड़ी
अधिवक्ता शुभम माडिल के अनुसार, महू क्षेत्र के तीन आरोपितों के खिलाफ वर्ष 2020 में फरियादी अब्दुल रशीद ने धोखाधड़ी की शिकायत दर्ज कराई थी। आरोप है कि प्लॉट के सौदे के नाम पर आरोपितों ने फरियादी से 21 लाख रुपये से अधिक की राशि ले ली, लेकिन न तो प्लॉट दिया और न ही रकम वापस की। इसके बाद आरोपित फरार हो गए।फरियादी ने मामला दर्ज कराने के लिए लंबे समय तक पुलिस अधिकारियों और कार्यालयों के चक्कर लगाए। कई बार वरिष्ठ अधिकारियों से गुहार लगाने के बाद पुलिस ने आखिरकार एफआईआर दर्ज कर ली, लेकिन इसके बाद भी जांच आगे नहीं बढ़ाई गई और कोर्ट में चालान पेश करना ही भूल गई।
कोर्ट पहुंचा फरियादी, जारी हुआ नोटिस
लंबे समय तक कार्रवाई नहीं होने पर फरियादी ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट ने मामले को गंभीरता से लेते हुए पुलिस से जवाब मांगा और नोटिस जारी किया। नोटिस मिलते ही पुलिस विभाग में हड़कंप मच गया और लंबित जांच को तेजी से पूरा कर कोर्ट में चालान पेश कर दिया गया।
पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल
इस पूरे मामले ने जांच प्रक्रिया की गंभीर खामियों को उजागर कर दिया है। एफआईआर दर्ज होने के बाद भी वर्षों तक चालान पेश न होना न केवल लापरवाही को दर्शाता है, बल्कि पीड़ित को न्याय मिलने में अनावश्यक देरी का कारण भी बनता है।कानूनी जानकारों का कहना है कि समय पर चालान पेश न होने से आरोपितों को फायदा मिलता है और पीड़ित पक्ष का भरोसा व्यवस्था से उठता है। न्यायालय द्वारा समय-समय पर ऐसे मामलों में हस्तक्षेप ही पीड़ितों के लिए राहत का रास्ता बनता है।यह मामला पुलिस की जवाबदेही और जांच प्रक्रिया की निगरानी की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है, ताकि भविष्य में किसी भी पीड़ित को न्याय के लिए वर्षों तक इंतजार न करना पड़े।
