पंचम अपर सत्र न्यायालय का फैसला : हत्या के मामले में दोनों दोषियों को बीएनएस की धारा 103(1) सहपठित धारा 3(5) के तहत सजा, 1-1 हजार रुपये अर्थदंड भी
दमोह। किसी विवाद या रंजिश का परिणाम यदि हिंसा और हत्या के रूप में सामने आता है तो उसका कानूनी परिणाम भी गंभीर हो सकता है। दमोह के एक हत्या प्रकरण में पंचम अपर सत्र न्यायालय ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए पिता-पुत्र को आजीवन कारावास की सजा से दंडित किया है। न्यायालय ने दोनों अभियुक्तों को भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) 2023 की धारा 103(1) सहपठित धारा 3(5) के तहत दोषसिद्ध माना। दोनों पर 1-1 हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया गया है।
प्रकरण में पंचम अपर सत्र न्यायाधीश पंकज कुमार वर्मा की अदालत ने अब्दुल अकील खान पिता नसीर खान, उम्र 35 वर्ष तथा नसीर खान पिता अब्दुल रज्जाक, उम्र 59 वर्ष, दोनों निवासी अजमेरी हाल के पास, बजरिया वार्ड क्रमांक-4, हजारी की तलैया, थाना कोतवाली, जिला दमोह को यह सजा सुनाई।
11 जुलाई 2025 की घटना, कार से कुचलने का आरोप
अभियोजन के अनुसार 11 जुलाई 2025 की शाम करीब 6:30 बजे अजमेरी गार्डन तिगड्डा, दमोह के पास यह घटना हुई थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार नसीर खान द्वारा इशारा किए जाने के तत्काल बाद अब्दुल अकील खान ने सफेद रंग की स्विफ्ट डिजायर कार क्रमांक MP-20-CF-4322 को तेज गति से चलाते हुए रक्के उर्फ राकेश रैकवार के ऊपर चढ़ा दिया।
अभियोजन के अनुसार कार की चपेट में आने के बाद राकेश को लगभग 80 फुट तक घसीटा गया। घटना में उसे गंभीर आंतरिक एवं बाहरी चोटें आईं। बाद में उपचार के दौरान उसकी मृत्यु हो गई।घटना के बाद फरियादिया खिलौनाबाई की रिपोर्ट पर थाना कोतवाली दमोह में अपराध क्रमांक 520/2025 दर्ज किया गया। पुलिस ने प्रकरण की विवेचना करते हुए साक्ष्य एकत्र किए और विवेचना पूरी होने के बाद अभियोग पत्र न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया।
मौखिक, दस्तावेजी और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर हुआ विचार
मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय के समक्ष अभियोजन द्वारा मौखिक एवं दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत किए गए। इसके साथ ही पोस्टमार्टम रिपोर्ट तथा परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को भी न्यायालय के समक्ष रखा गया।न्यायालय ने उपलब्ध साक्ष्यों और अभियोजन द्वारा प्रस्तुत तर्कों पर विचार करने के बाद दोनों अभियुक्तों को दोषसिद्ध माना। इसके बाद दोनों को बीएनएस की धारा 103(1) सहपठित धारा 3(5) के तहत आजीवन कारावास तथा 1-1 हजार रुपये के अर्थदंड से दंडित किया।
फैसला यह संदेश भी देता है कि विवाद का रास्ता हिंसा नहीं
इस मामले का न्यायालयीन फैसला केवल एक आपराधिक प्रकरण का निष्कर्ष नहीं है, बल्कि समाज के लिए यह संदेश भी देता है कि किसी विवाद, मतभेद या व्यक्तिगत रंजिश का समाधान हिंसा के माध्यम से करने का परिणाम बेहद गंभीर हो सकता है। कानून अपने हाथ में लेने की स्थिति में मामला केवल विवाद तक सीमित नहीं रहता, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार गंभीर आपराधिक अपराध में बदल सकता है।
किसी व्यक्ति के जीवन की क्षति की भरपाई किसी भी सजा से संभव नहीं होती। ऐसे मामलों में न्यायिक प्रक्रिया साक्ष्यों के आधार पर यह निर्धारित करती है कि अपराध के लिए कौन जिम्मेदार है और कानून के अनुसार क्या दंड निर्धारित किया जाना चाहिए। इसलिए सामाजिक स्तर पर भी विवादों को बातचीत, मध्यस्थता और कानूनसम्मत प्रक्रिया के माध्यम से सुलझाने की आवश्यकता बनी रहती है।
अभियोजन की प्रभावी पैरवी
प्रकरण में सहायक निदेशक अभियोजन धर्मेन्द्र सिंह तारन के मार्गदर्शन में सहायक जिला अभियोजन अधिकारी सतीश कपस्या एवं एडीपीओ एन.पी. पटेल, दमोह द्वारा अभियोजन की ओर से पैरवी की गई। सहायक विनय नामदेव द्वारा भी आवश्यक सहयोग प्रदान किया गया।न्यायालय द्वारा सुनाया गया यह फैसला एक बार फिर इस बात को रेखांकित करता है कि गंभीर अपराधों के मामलों में साक्ष्यों और विधिक प्रक्रिया के आधार पर न्यायालय अंतिम निर्णय करता है। समाज के लिए आवश्यक संदेश यही है कि किसी भी विवाद को हिंसा में बदलने के बजाय कानून और संवाद का रास्ता अपनाया जाए, क्योंकि एक क्षण का आक्रोश कई परिवारों की जिंदगी को लंबे समय तक प्रभावित कर सकता है।
