भर्ती के लक्ष्य के बीच मौजूदा पुलिसकर्मियों पर बढ़ रहा काम का दबाव, गश्त से लेकर विवेचना और कानून-व्यवस्था तक प्रभावित होने की आशंका

(डॉ.एल.एन.वैष्णव)
भोपाल। मध्य प्रदेश में बढ़ती आबादी, बदलती सुरक्षा चुनौतियों और पुलिस विभाग की जिम्मेदारियों के बीच पर्याप्त पुलिस बल की उपलब्धता एक महत्वपूर्ण विषय बनकर सामने आई है। सूत्र बताते हैं कि प्रदेश में मौजूदा आवश्यकताओं के अनुरूप पुलिसकर्मियों की कमी को लेकर करीब 45 हजार अतिरिक्त जवानों की जरूरत का आकलन किया जा रहा है। दूसरी ओर, अगले तीन वर्षों में 22,500 आरक्षकों की भर्ती का लक्ष्य घोषित किया गया है और 9,662 पदों पर भर्ती प्रक्रिया चलने की जानकारी सामने आई है। ऐसे में सवाल यह है कि प्रस्तावित भर्तियों से वर्तमान रिक्तियों की कितनी भरपाई होगी और बढ़ती आबादी के अनुपात में अतिरिक्त पुलिस बल की जरूरत को पूरा करने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे।
पुलिस व्यवस्था की चुनौती केवल नए कर्मचारियों की भर्ती तक सीमित नहीं है। वर्तमान में उपलब्ध पुलिस बल को कानून-व्यवस्था बनाए रखने, अपराधों की रोकथाम, शिकायतों पर कार्रवाई, आपराधिक मामलों की विवेचना, न्यायालयीन कार्यवाही, यातायात प्रबंधन, त्योहारों और बड़े आयोजनों में सुरक्षा व्यवस्था तथा वीआईपी ड्यूटी जैसी अनेक जिम्मेदारियां निभानी पड़ती हैं। ऐसे में पर्याप्त संख्या में कर्मचारियों की उपलब्धता और उनके कार्यभार का संतुलन पुलिस प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है।
कम पुलिस बल, जिम्मेदारियां अनेक
सूत्रों के अनुसार, पुलिस विभाग में रिक्त पदों और उपलब्ध कर्मचारियों की संख्या के बीच अंतर का असर विभिन्न स्तरों पर महसूस किया जा सकता है। थानों में पदस्थ पुलिसकर्मियों को नियमित ड्यूटी के साथ शिकायतों की जांच, प्राथमिकी से संबंधित कार्रवाई, आरोपियों की तलाश, साक्ष्य संकलन, गिरफ्तारी, न्यायालय में प्रकरणों की पैरवी के लिए आवश्यक समन्वय और कानून-व्यवस्था संबंधी अतिरिक्त ड्यूटी भी करनी पड़ती है।
कई परिस्थितियों में एक ही पुलिसकर्मी को अलग-अलग प्रकार की जिम्मेदारियां संभालनी पड़ती हैं। त्योहारों, धार्मिक आयोजनों, जुलूसों, धरना-प्रदर्शनों, चुनावी गतिविधियों और विशेष सुरक्षा व्यवस्थाओं के दौरान अतिरिक्त बल की तैनाती आवश्यक हो जाती है। ऐसी स्थिति में नियमित गश्त और विवेचना के लिए उपलब्ध समय एवं कर्मचारियों पर दबाव बढ़ सकता है।हालांकि, इसका वास्तविक प्रभाव प्रत्येक जिले, थाने और कार्यक्षेत्र में अलग-अलग हो सकता है। इसकी स्पष्ट तस्वीर के लिए स्वीकृत पदों, रिक्तियों, वास्तविक तैनाती और पुलिसकर्मियों के कार्यभार से संबंधित अद्यतन आंकड़ों का आकलन जरूरी है।
भर्ती का लक्ष्य, लेकिन जरूरत का दायरा बड़ा
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा अगले तीन वर्षों में 22,500 आरक्षकों की भर्ती का लक्ष्य घोषित किए जाने की जानकारी है। वहीं, 9,662 पदों पर भर्ती प्रक्रिया जारी होने की बात सामने आई है। भर्ती अभियान से पुलिस विभाग में कर्मचारियों की उपलब्धता बढ़ाने में सहायता मिल सकती है, लेकिन इसके परिणाम का आकलन केवल घोषित संख्या के आधार पर नहीं किया जा सकता।
यह जानना भी जरूरी होगा कि प्रस्तावित भर्ती में कितने पद पहले से स्वीकृत रिक्तियों को भरने के लिए हैं और कितने नए पदों के सृजन से संबंधित हैं। यदि भर्ती का बड़ा हिस्सा मौजूदा रिक्त पदों को भरने में जाता है, तो वास्तविक पुलिस बल में सुधार होने के बावजूद भविष्य की अतिरिक्त जरूरत बनी रह सकती है।सूत्र बताते हैं कि पुलिस बल की आवश्यकता का आकलन करते समय आबादी के साथ-साथ शहरी विस्तार, औद्योगिक गतिविधियों, अपराध के बदलते स्वरूप, साइबर अपराधों, संवेदनशील क्षेत्रों और आपातकालीन परिस्थितियों में त्वरित प्रतिक्रिया की जरूरत को भी ध्यान में रखना होगा।
प्रति लाख आबादी पर पुलिसकर्मियों की उपलब्धता का सवाल
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, मध्य प्रदेश में प्रति एक लाख आबादी पर औसतन 121.76 पुलिसकर्मी उपलब्ध होने की जानकारी दी गई है, जबकि प्रदेश में स्वीकृत पदों का अनुपात 143 बताया गया है। राष्ट्रीय स्तर पर प्रति एक लाख आबादी पर 197 पुलिस पद स्वीकृत होने का आंकड़ा भी सामने आया है।इन आंकड़ों की तुलना करते समय यह अंतर समझना आवश्यक है कि स्वीकृत पद और वास्तव में कार्यरत पुलिसकर्मियों की संख्या अलग-अलग होती है। केवल स्वीकृत पदों की संख्या से यह पता नहीं चलता कि जमीन पर कितने कर्मचारी उपलब्ध हैं और उनकी तैनाती किन क्षेत्रों में है।पुलिस बल की वास्तविक स्थिति जानने के लिए यह देखना होगा कि थानों, चौकियों, यातायात इकाइयों, साइबर अपराध शाखाओं और अन्य विशेष इकाइयों में कितने कर्मचारी कार्यरत हैं। साथ ही, लंबी ड्यूटी, अवकाश की उपलब्धता, प्रशिक्षण और अन्य प्रशासनिक दायित्वों के कारण वास्तविक कार्यबल पर पड़ने वाले प्रभाव को भी समझना होगा।
बढ़ते कार्यभार के बीच विवेचना और गश्त बड़ी जिम्मेदारी
पुलिसकर्मियों की जिम्मेदारियां केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने तक सीमित नहीं हैं। किसी अपराध की सूचना मिलने के बाद घटनास्थल पर पहुंचना, साक्ष्य जुटाना, गवाहों के बयान दर्ज करना, आरोपियों की तलाश करना और निर्धारित समय-सीमा में विवेचना पूरी करना भी पुलिस की जिम्मेदारी है।यदि उपलब्ध कर्मचारियों को लगातार बंदोबस्त, गश्त और अन्य अतिरिक्त ड्यूटी में लगाया जाता है, तो विवेचना के लिए समय का प्रबंधन चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इसी प्रकार, थानों में शिकायतों की बढ़ती संख्या और विभिन्न प्रकार के प्रशासनिक कार्यों के बीच नागरिकों को समय पर सहायता उपलब्ध कराना भी महत्वपूर्ण है।
साइबर अपराधों और डिजिटल माध्यमों से होने वाली धोखाधड़ी के बढ़ते स्वरूप ने पुलिस के सामने तकनीकी दक्षता और विशेषज्ञ कर्मचारियों की आवश्यकता को भी महत्वपूर्ण बनाया है। ऐसे मामलों में केवल कर्मचारियों की संख्या बढ़ाना ही नहीं, बल्कि उन्हें आधुनिक तकनीक, डिजिटल साक्ष्य और नए अपराध तरीकों के अनुरूप प्रशिक्षण देना भी आवश्यक है।
2011 के बाद बढ़ी आबादी, दीर्घकालिक योजना की जरूरत
वर्ष 2011 की जनगणना के समय मध्य प्रदेश की आबादी लगभग 7.60 करोड़ बताई गई थी। उस समय भी पुलिस विभाग में करीब 18 हजार पदों की कमी का उल्लेख किया गया था। इसके बाद आबादी, शहरीकरण और प्रशासनिक जिम्मेदारियों में हुए बदलावों के बीच पुलिस बल की जरूरत का नए सिरे से आकलन करना महत्वपूर्ण हो गया है।
बदलते समय में पुलिस की भूमिका भी अधिक व्यापक हुई है। पारंपरिक अपराधों के साथ साइबर धोखाधड़ी, ऑनलाइन वित्तीय अपराध, महिला सुरक्षा, यातायात प्रबंधन और आपदा या आपातकालीन स्थितियों में त्वरित कार्रवाई जैसी जिम्मेदारियां बढ़ी हैं। ऐसे में पुलिस बल की योजना केवल वर्तमान रिक्तियों को भरने तक सीमित रखने के बजाय आने वाले वर्षों की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाई जानी चाहिए।इसके लिए जिलावार समीक्षा, थानों की कार्यक्षमता का आकलन, संवेदनशील क्षेत्रों में पर्याप्त तैनाती और आवश्यकतानुसार नए पदों के सृजन पर विचार किया जा सकता है।
केंद्र स्तर पर भी रिक्तियों का मुद्दा महत्वपूर्ण
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधिकारियों ने भोपाल दौरे के दौरान मध्य प्रदेश पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक में रिक्त पदों को भरने पर जोर दिया था। यह बैठक केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के दौरे के दौरान हुई थी।ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट की रिपोर्ट पर आधारित आंकड़ों के मुताबिक, 31 दिसंबर 2024 को देश में प्रति एक लाख आबादी पर पुलिसकर्मियों के 197 पद स्वीकृत थे, जबकि वास्तविक उपलब्धता 152.80 पुलिसकर्मी प्रति लाख आबादी बताई गई थी। ये आंकड़े राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत पदों और वास्तविक उपलब्धता के बीच अंतर की ओर संकेत करते हैं।
सवाल केवल भर्ती का नहीं, कार्यक्षमता और संसाधनों का भी
मध्य प्रदेश में पुलिस बल की कमी का विषय कई महत्वपूर्ण सवाल सामने रखता है। क्या वर्तमान भर्ती लक्ष्य से मौजूदा रिक्तियां पर्याप्त रूप से भर पाएंगी? क्या बढ़ती आबादी और बदलती सुरक्षा जरूरतों के अनुरूप नए पदों का सृजन किया जाएगा? थानों में पदस्थ पुलिसकर्मियों पर काम का कितना दबाव है? और क्या जिलावार तैनाती की समीक्षा कर गश्त, विवेचना तथा नागरिकों की शिकायतों के निराकरण के लिए पर्याप्त समय और कर्मचारी उपलब्ध कराए जा सकते हैं?
इन सवालों का जवाब अद्यतन सरकारी आंकड़ों और विभागीय समीक्षा से ही स्पष्ट हो सकेगा। पुलिस व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए भर्ती अभियान के साथ रिक्त पदों को समयबद्ध तरीके से भरना, आवश्यकता के अनुरूप नए पद स्वीकृत करना, तकनीकी प्रशिक्षण बढ़ाना और कर्मचारियों के कार्यभार का संतुलित प्रबंधन करना भी जरूरी है।
प्रदेश में नागरिकों की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की प्रभावशीलता के लिए पर्याप्त पुलिस बल एक बुनियादी आवश्यकता है। इसलिए मौजूदा स्थिति का नियमित आकलन और भविष्य की जरूरतों के अनुरूप ठोस योजना बनाना महत्वपूर्ण होगा।
