️नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने एससी-एसटी एक्ट और अनुसूचित जाति के दर्जे से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा और स्पष्ट निर्णय सुनाया है। अदालत ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को अपनाता है, तो उसे अनुसूचित जाति (SC) का सदस्य नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के पहले दिए गए फैसले को सही ठहराते हुए इसे बरकरार रखा।
धर्म परिवर्तन के साथ ही SC दर्जा समाप्त
न्यायमूर्ति पी.के. मिश्रा और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने कहा कि किसी अन्य धर्म में धर्मांतरण करते ही अनुसूचित जाति का दर्जा तुरंत और पूरी तरह समाप्त हो जाता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह नियम बिना किसी अपवाद के लागू होगा और इसमें किसी प्रकार की व्याख्या की गुंजाइश नहीं है।
1950 के संवैधानिक आदेश का हवाला
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 का उल्लेख करते हुए कहा कि इसके क्लॉज-3 में स्पष्ट है कि केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म से संबंधित व्यक्तियों को ही अनुसूचित जाति का लाभ दिया जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति ईसाई या अन्य धर्म अपनाता है, तो उसका SC दर्जा स्वतः समाप्त माना जाएगा।
आरक्षण और कानूनी लाभ नहीं मिलेंगे
अदालत ने अपने निर्णय में यह भी साफ किया कि जो व्यक्ति अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाएगा, वह:
- आरक्षण का लाभ नहीं ले सकेगा
- एससी-एसटी एक्ट की सुरक्षा का दावा नहीं कर सकेगा
- किसी भी वैधानिक अधिकार या विशेष सुविधा का पात्र नहीं होगा
कोर्ट ने दो टूक कहा कि कोई व्यक्ति एक साथ किसी अन्य धर्म का पालन करते हुए अनुसूचित जाति का दर्जा बनाए नहीं रख सकता।
आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले को मिली पुष्टि
आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने पहले कहा था कि जो लोग ईसाई धर्म अपनाते हैं और सक्रिय रूप से उसका पालन करते हैं, वे अनुसूचित जाति का दर्जा नहीं रख सकते। सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय को सही ठहराते हुए स्पष्ट किया कि कानून पहले से ही इस विषय में पूरी तरह स्पष्ट है।
👉 इस फैसले को आरक्षण नीति और एससी-एसटी एक्ट से जुड़े मामलों में मील का पत्थर माना जा रहा है, क्योंकि इससे धर्म परिवर्तन और सामाजिक श्रेणी के बीच कानूनी स्थिति पर स्पष्टता आ गई है।
