पथरिया थाना क्षेत्र के चर्चित दुष्कर्म प्रकरण में सोशल मीडिया लाइव के दौरान गोपनीय जानकारी साझा करने का आरोप, पॉक्सो एक्ट समेत विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज
दमोह, 20 जून (शनिवार)। सोशल मीडिया के दौर में तेजी से लोकप्रिय होने और अधिक से अधिक व्यूज़ हासिल करने की होड़ कई बार कानूनी और नैतिक सीमाओं को पार कर जाती है। मध्य प्रदेश के दमोह जिले के पथरिया थाना क्षेत्र में सामने आया एक मामला इसी चुनौती की ओर इशारा करता है। एक दुष्कर्म प्रकरण से जुड़ी नाबालिग पीड़िता की पहचान सार्वजनिक करने के आरोप में दो यूट्यूबरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेते हुए विस्तृत जांच शुरू कर दी है।
पुलिस सूत्रों के अनुसार, आरोपी यूट्यूबर पुष्पेंद्र सिंह लोधी घूसस और पुष्पेंद्र सिंह लोधी चंडी चौपरा ने फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एक चर्चित दुष्कर्म मामले को लेकर लाइव प्रसारण किया था। आरोप है कि इस दौरान दोनों ने पीड़िता और उसके परिजनों से बातचीत प्रसारित की तथा चर्चा के दौरान ऐसी जानकारियां सार्वजनिक कर दीं, जिन्हें कानून के अनुसार गोपनीय रखा जाना आवश्यक है।
प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि लाइव वीडियो में नाबालिग पीड़िता की पहचान से संबंधित जानकारी, निवास क्षेत्र और अन्य निजी विवरण साझा किए गए। इतना ही नहीं, पीड़िता के जीवन से जुड़ी कुछ संवेदनशील जानकारियों को भी सार्वजनिक मंच पर प्रसारित किया गया। वीडियो के सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल होने के बाद मामला पुलिस के संज्ञान में आया।
शिकायत मिलने पर पुलिस ने संबंधित वीडियो और अन्य डिजिटल साक्ष्यों की जांच की। प्रथम दृष्टया आरोप सही पाए जाने पर पथरिया थाना पुलिस ने दोनों आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 72(1) और 3(5), पॉक्सो एक्ट की धारा 23(4) तथा किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा 74 के तहत प्रकरण दर्ज किया है।
कानून क्या कहता है?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी यौन अपराध, विशेषकर नाबालिगों से जुड़े मामलों में पीड़ित की पहचान उजागर करना गंभीर और दंडनीय अपराध है। कानून के तहत पीड़ित का नाम, पता, फोटो, वीडियो, पारिवारिक जानकारी, स्कूल, गांव या ऐसी कोई भी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा सकती, जिससे उसकी पहचान सामने आने की संभावना हो।
पॉक्सो एक्ट और किशोर न्याय अधिनियम के प्रावधानों का उद्देश्य पीड़ित बच्चों की गरिमा, सुरक्षा और भविष्य की रक्षा करना है। विशेषज्ञों का कहना है कि पहचान उजागर होने से पीड़ित और उसके परिवार को सामाजिक दबाव, मानसिक आघात और लंबे समय तक भेदभाव का सामना करना पड़ सकता है।
सोशल मीडिया पर बढ़ती गैर-जिम्मेदारी चिंता का विषय
डिजिटल प्लेटफॉर्म ने आम लोगों को अपनी बात रखने और समाज के मुद्दों को सामने लाने का अवसर दिया है, लेकिन इसके साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी हुई है। पिछले कुछ वर्षों में व्यूज़, लाइक और फॉलोअर्स बढ़ाने की प्रतिस्पर्धा में कई कंटेंट क्रिएटर संवेदनशील मामलों को सनसनीखेज तरीके से प्रस्तुत कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यौन अपराधों से जुड़े मामलों में रिपोर्टिंग करते समय पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों और कानूनी प्रावधानों का पालन करना अनिवार्य है। केवल तथ्य प्रस्तुत करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि किसी पीड़ित की गरिमा और निजता प्रभावित न हो।
क्षेत्र में आक्रोश, जिम्मेदार डिजिटल व्यवहार की मांग
मामले के सामने आने के बाद क्षेत्र में लोगों के बीच नाराजगी देखी जा रही है। स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि सोशल मीडिया पर लोकप्रियता हासिल करने के लिए संवेदनशील मामलों का उपयोग करना बेहद चिंताजनक है।
लोगों का कहना है कि कानून की जानकारी के अभाव या जानबूझकर की गई लापरवाही, दोनों ही परिस्थितियों में ऐसे कृत्यों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। उन्होंने प्रशासन से दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है।
पुलिस की अपील
पुलिस अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि किसी भी यौन अपराध, विशेषकर नाबालिगों से जुड़े मामलों में पीड़ित की पहचान सार्वजनिक करना कानूनन अपराध है। सोशल मीडिया संचालकों, यूट्यूबरों, डिजिटल कंटेंट निर्माताओं और आम नागरिकों से अपील की गई है कि वे ऐसी सामग्री को न तो साझा करें और न ही आगे प्रसारित करें।
पुलिस ने यह भी कहा है कि यदि किसी व्यक्ति को सोशल मीडिया पर इस प्रकार की कोई सामग्री दिखाई देती है, तो वह तुरंत संबंधित प्लेटफॉर्म पर उसकी शिकायत करे और स्थानीय पुलिस को सूचना दे।
फिलहाल पुलिस मामले की विस्तृत जांच कर रही है। वीडियो प्रसारण से जुड़े अन्य तथ्यों और डिजिटल साक्ष्यों की भी पड़ताल की जा रही है। जांच में यदि अतिरिक्त तथ्य सामने आते हैं, तो प्रकरण में अन्य धाराएं भी जोड़ी जा सकती हैं।
समाज के लिए संदेश
यह मामला केवल कानूनी कार्रवाई तक सीमित नहीं है, बल्कि डिजिटल युग में जिम्मेदार नागरिक बनने की सीख भी देता है। किसी भी संवेदनशील घटना को साझा करने से पहले यह समझना जरूरी है कि एक क्लिक या एक लाइव वीडियो किसी पीड़ित और उसके परिवार के जीवन पर गहरा प्रभाव डाल सकता है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ सामाजिक और कानूनी जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। व्यूज़ और वायरल होने की दौड़ में मानव संवेदनाओं, निजता और कानून की सीमाओं का सम्मान करना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।
