सेवा सदन आई हॉस्पिटल भोपाल ने फिर पेश की संवेदनशीलता, विशेषज्ञता और मानव सेवा की मिसाल
भोपाल/छिंदवाड़ा/कहते हैं कि डॉक्टर केवल मरीजों का इलाज नहीं करते, बल्कि कई बार पूरे परिवार की उम्मीदों को नया जीवन देते हैं। ऐसा ही एक भावुक, प्रेरणादायक और मानवता से जुड़ा मामला मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले से सामने आया है, जहां समय से पहले जन्मे जुड़वा नवजात शिशुओं की आंखों की रोशनी को बचाकर चिकित्सकों ने न केवल एक गंभीर चिकित्सकीय चुनौती को सफलतापूर्वक पार किया, बल्कि एक गरीब परिवार के जीवन में उम्मीद का नया सूरज भी उगा दिया।
आर्थिक रूप से कमजोर परिवार में जन्मे इन मासूम बच्चों के सामने जन्म के कुछ ही दिनों बाद अंधेपन का गंभीर खतरा खड़ा हो गया था। परिवार के पास इलाज के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं थे और स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही थी। लेकिन जिला अस्पताल छिंदवाड़ा के चिकित्सकों की सतर्कता, सेवा सदन आई हॉस्पिटल भोपाल की संवेदनशील पहल और विशेषज्ञ डॉक्टरों की तत्परता ने दोनों बच्चों की आंखों की रोशनी सुरक्षित कर दी।
सात महीने में हुआ जन्म, जिंदगी के लिए शुरू हो गया संघर्ष
छिंदवाड़ा निवासी राज और रानी के घर 27 दिन पहले जुड़वा बच्चों—एक बेटे और एक बेटी—का जन्म हुआ। दोनों शिशुओं का जन्म सामान्य समय से काफी पहले, मात्र सात महीने की गर्भावस्था में हुआ था। समय पूर्व जन्म लेने के कारण दोनों बच्चों की शारीरिक स्थिति अत्यंत कमजोर थी और जन्म के तुरंत बाद उन्हें जिला अस्पताल छिंदवाड़ा की नवजात गहन चिकित्सा इकाई (NICU) में भर्ती करना पड़ा।
चिकित्सकों के अनुसार बेटे का वजन मात्र 1 किलो 200 ग्राम तथा बेटी का वजन 1 किलो 300 ग्राम था। इतने कम वजन और समय पूर्व जन्म के कारण दोनों बच्चों को कई स्वास्थ्य चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था। जांच के दौरान डॉक्टरों को उनकी आंखों में रेटिनोपैथी ऑफ प्रीमैच्योरिटी (ROP) नामक गंभीर बीमारी के संकेत मिले।
विशेषज्ञों के अनुसार आरओपी समय से पहले जन्मे बच्चों में होने वाली एक गंभीर बीमारी है, जिसमें आंखों की रेटिना में असामान्य रक्त वाहिकाएं विकसित होने लगती हैं। यदि समय रहते उपचार न मिले तो यह बीमारी रेटिना को स्थायी नुकसान पहुंचाकर बच्चे को जीवनभर के लिए अंधत्व की ओर धकेल सकती है।
आर्थिक तंगी ने बढ़ाई चिंता, इलाज का खर्च बना सबसे बड़ी चुनौती
पहले से ही आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रहे परिवार के लिए बच्चों की यह गंभीर बीमारी किसी बड़े संकट से कम नहीं थी। माता-पिता अपने बच्चों की हालत देखकर पूरी तरह चिंतित थे। उन्हें यह भय सताने लगा था कि कहीं इलाज में देरी उनके बच्चों की आंखों की रोशनी हमेशा के लिए न छीन ले।महंगे उपचार की संभावना ने परिवार की परेशानी और बढ़ा दी थी। ऐसे समय में जब उम्मीदें टूटती हुई नजर आ रही थीं, तब सेवा सदन आई हॉस्पिटल भोपाल ने मानवता और सेवा का परिचय देते हुए दोनों बच्चों का उपचार निःशुल्क करने का निर्णय लिया।
जिला अस्पताल की तत्परता ने बचाया बहुमूल्य समय
जिला अस्पताल छिंदवाड़ा के चिकित्सकों ने बीमारी की गंभीरता को समझते हुए बिना समय गंवाए दोनों बच्चों को भोपाल रेफर कर दिया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि बच्चों को सुरक्षित और शीघ्र उपचार मिल सके, इसके लिए अस्पताल प्रशासन ने स्वयं वाहन की व्यवस्था कर दोनों नवजातों को भोपाल पहुंचाने में मदद की।चिकित्सकों का मानना है कि आरओपी जैसी बीमारी में हर दिन महत्वपूर्ण होता है। यदि उपचार में थोड़ी भी देरी होती तो बच्चों की आंखों को स्थायी नुकसान पहुंच सकता था।
डॉ. सोनल पालीवाल की विशेषज्ञता से बची रोशनी
भोपाल स्थित सेवा सदन आई हॉस्पिटल पहुंचने के बाद वरिष्ठ रेटिना विशेषज्ञ डॉ. सोनल पालीवाल ने दोनों बच्चों की विस्तृत जांच की। डॉ. पालीवाल पिछले छह वर्षों से आरओपी जैसी जटिल बीमारियों के उपचार और जागरूकता अभियान से जुड़ी हुई हैं।
जांच के दौरान पाया गया कि दोनों बच्चों को तत्काल एंटी-VEGF इंजेक्शन देने की आवश्यकता है। यह आधुनिक उपचार आंखों में बनने वाली असामान्य रक्त वाहिकाओं की वृद्धि को रोकता है और रेटिना को क्षति पहुंचने से बचाता है।विशेषज्ञों के अनुसार यह उपचार बच्चों को रेटिना डिटैचमेंट, आंखों में रक्तस्राव और स्थायी अंधेपन जैसी गंभीर समस्याओं से बचाने में अत्यंत प्रभावी माना जाता है।समय रहते उपचार मिलने के कारण दोनों बच्चों की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ और उनकी आंखों की रोशनी सुरक्षित रखने में सफलता मिली।
माता-पिता की आंखों में लौट आई खुशी
जब डॉक्टरों ने बताया कि दोनों बच्चों की आंखों की रोशनी सुरक्षित है, तब परिवार की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। माता-पिता ने भावुक होकर सेवा सदन आई हॉस्पिटल, जिला अस्पताल छिंदवाड़ा और पूरी चिकित्सकीय टीम का आभार व्यक्त किया।परिवार ने कहा कि यदि समय पर सहायता और उपचार नहीं मिलता तो उनके बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो सकता था। अस्पताल द्वारा निःशुल्क इलाज और हर स्तर पर सहयोग ने उन्हें आर्थिक और मानसिक दोनों तरह की राहत प्रदान की।
हर प्रीमैच्योर बच्चे की आंखों की जांच बेहद जरूरी
डॉ. सोनल पालीवाल ने बताया कि 34 सप्ताह से कम अवधि में जन्म लेने वाले तथा 2000 ग्राम से कम वजन वाले प्रत्येक बच्चे की आंखों की जांच जन्म के 20 से 30 दिनों के भीतर अवश्य करानी चाहिए।उन्होंने कहा कि अधिकांश माता-पिता आरओपी जैसी बीमारी से अनजान रहते हैं, जिसके कारण कई बच्चों को समय पर उपचार नहीं मिल पाता। जबकि थोड़ी सी जागरूकता हजारों बच्चों को आजीवन अंधेपन से बचा सकती है।
विशेषज्ञों की टीमवर्क से मिली सफलता
अस्पताल प्रबंधन के अनुसार इस तरह के मामलों में गायनेकोलॉजिस्ट, पीडियाट्रिशियन, एनआईसीयू विशेषज्ञ और रेटिना विशेषज्ञों का समन्वित प्रयास बेहद महत्वपूर्ण होता है। सभी विशेषज्ञों की सतर्कता और समय पर निर्णय लेने की क्षमता के कारण ही ऐसे बच्चों की पहचान समय रहते हो पाती है और उनका सफल उपचार संभव हो पाता है।
समाज के लिए प्रेरणादायक संदेश
सेवा सदन आई हॉस्पिटल का यह प्रयास केवल दो बच्चों की आंखों की रोशनी बचाने की कहानी नहीं है, बल्कि यह समाज को जागरूक करने वाला एक महत्वपूर्ण संदेश भी है। यह घटना बताती है कि चिकित्सा सेवा केवल पेशा नहीं, बल्कि मानवता की सबसे बड़ी सेवा भी हो सकती है।यह सफलता इस बात का प्रमाण है कि यदि समय पर जांच, सही उपचार और संवेदनशील चिकित्सा सहयोग मिल जाए तो समय पूर्व जन्मे बच्चों को भी स्वस्थ और उज्ज्वल भविष्य दिया जा सकता है।
“हर प्रीमैच्योर बच्चे की आंखों की जांच जरूरी है, क्योंकि समय पर पहचान और उपचार से बच्चों को जीवनभर के अंधेपन से बचाया जा सकता है।”
आज ये दोनों मासूम बच्चे केवल एक सफल इलाज की कहानी नहीं हैं, बल्कि उन हजारों परिवारों के लिए उम्मीद का संदेश हैं जो समय पूर्व जन्मे बच्चों की स्वास्थ्य चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।
