(डॉ एल एन वैष्णव)
भोपाल/मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य महकमे से जारी एक आदेश ने लंबे समय से विवादों में रही डॉ. ममता तिमोरी को एक बार फिर सुर्खियों के केंद्र में ला दिया है। सागर संभाग से जुड़े इस मामले में विभाग ने साफ कर दिया है कि नियमों की अनदेखी अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी—लेकिन सवाल यह है कि यह सख्ती अब तक क्यों नहीं दिखी?आधिकारिक पत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि डॉ. तिमोरी ने अनिवार्य 20 वर्षों की क्लिनिकल सेवा पूरी नहीं की। आंकड़ों के मुताबिक वे महज 17 वर्ष 5 माह की सेवा ही दे सकीं। इसके बावजूद वर्षों तक उच्च पदों पर बनी रहीं—क्या यह सिस्टम की कमजोरी नहीं दर्शाता?

सेवा अधूरी, फिर भी पद पूरे—किसके संरक्षण में चल रहा था खेल?
दस्तावेज़ यह भी बताता है कि 11 अप्रैल 1962 को जन्मी डॉ. तिमोरी 30 अप्रैल 2024 को 62 वर्ष की आयु पूरी कर चुकी थीं। इसके बाद भी उनकी सेवा स्थिति को लेकर समय रहते स्पष्ट निर्णय नहीं लिया गया।अब विभाग ने निर्देश दिए हैं कि उन्हें तत्काल प्रभाव से सेवा से पृथक किया जाए। लेकिन बड़ा सवाल यही है—जब नियम पहले से स्पष्ट थे, तो कार्रवाई में इतनी देरी क्यों?
विवादों की लंबी फेहरिस्त, फिर भी मिलती रही जिम्मेदारी
दमोह जिला अस्पताल में सिविल सर्जन सह अधीक्षक के पद पर रहते हुए डॉ. ममता तिमोरी का कार्यकाल लगातार विवादों से घिरा रहा।
- महिला चिकित्सा अधिकारियों के साथ टकराव
- पद और प्रतिष्ठा को लेकर खींचतान
- विभागीय माहौल बिगाड़ने के आरोप
ये सिर्फ आरोप नहीं थे, बल्कि लंबे समय तक चर्चा और शिकायतों का हिस्सा रहे।
भ्रष्टाचार के आरोप—जांच हुई, लेकिन नतीजे कहाँ?
डॉ. तिमोरी पर भ्रष्टाचार से जुड़े गंभीर आरोप भी लगे। प्रशासनिक स्तर पर जांच होने की बात सामने आई, लेकिन नतीजों को लेकर हमेशा धुंध बनी रही।
यही वह बिंदु है जो पूरे सिस्टम पर सवाल खड़ा करता है—
क्या जांच सिर्फ फाइलों में दबाने के लिए होती है?
या फिर जिम्मेदारों को बचाने का खेल चलता रहता है?
अब कार्रवाई, लेकिन क्या यह ‘डैमेज कंट्रोल’ है?
स्वास्थ्य विभाग की यह कार्रवाई अब “डैमेज कंट्रोल” जैसी नजर आ रही है। वर्षों तक विवादों में रहने के बावजूद जिम्मेदार पदों पर बने रहना और फिर अचानक नियमों का हवाला देकर कार्रवाई करना—यह प्रशासनिक मंशा पर सवाल खड़े करता है।
जनता का सवाल—जिम्मेदार कौन?
- क्या केवल डॉ. तिमोरी ही दोषी हैं?
- या फिर वे अधिकारी भी जवाबदेह हैं जिन्होंने नियमों को नजरअंदाज किया?
- क्या इस पूरे मामले में उच्च स्तर पर जवाबदेही तय होगी?
निष्कर्ष: सिस्टम पर उठते गंभीर सवाल
यह मामला सिर्फ एक अधिकारी की सेवा समाप्ति का नहीं है, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल है। अगर समय रहते नियमों का पालन होता, तो शायद आज यह स्थिति पैदा ही नहीं होती।अब देखना होगा कि यह कार्रवाई यहीं थम जाती है या फिर जिम्मेदारी तय करने की दिशा में कोई ठोस कदम भी उठाया जाता है।
