नई दिल्ली। आज रविवार को दीपावली (Diwali 2026 ) का पर्व है। दिवाली हिंदू धर्म का सबसे बड़ा और प्रमुख त्योहार माना जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, हर वर्ष कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि (Amavasya Tithi) को देशभर में दिवाली का त्योहार बड़े ही उत्साह और धूमधाम के साथ मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीराम (Lord Shri Ram) 14 वर्ष का वनवास पूरा करके माता सीता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या आए थे, जिसके स्वागत में अयोध्या के लोगों ने दीपक जलाकर स्वागत और खुशियां मनाई थीं।
दिवाली के दिन माता लक्ष्मी, भगवान गणेश और कुबेर देवता ही पूजा करने विधान होता है। शास्त्रों के अनुसार, दिवाली के दिन माता लक्ष्मी की पूजा प्रदोष काल और निशिता काल में होती है। दिवाली की रात माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि, धन-वैभव और खुशहाली आती है।
दिवाली पर कितने दीपक जलाने चाहिए?
शास्त्रों के अनुसार, दीपावली के दिन कम से कम पांच दीपक जलाने की परंपरा प्रचलित है। इस दिन अपनी श्रद्धा के अनुसार 11, 21, 51, 101 या 108 दीपक भी जलाए जा सकते हैं। माना जाता है कि दीपों की रोशनी से घर में सकारात्मकता आती है और सुख-समृद्धि का वास होता है।
दिवाली पर लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति किस दिशा में रखनी चाहिए?
शास्त्रों के अनुसार, माता लक्ष्मी को हमेशा गणेश जी के दाहिने तरफ विराजमान करना चाहिए और गणेश जी को माता लक्ष्मी के बाएं तरफ विराजमान करना चाहिए। अगर आप सामने की तरफ से मूर्तियों को देख रहे हैं तो गणेश जी बाईं तरफ और माता लक्ष्मी आपके दाहिने तरफ होनी चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि, बाई तरफ पत्नी का स्थान होता है। इसलिए माता लक्ष्मी को हमेशा दाहिनी तरफ ही विराजमान करना चाहिए।
दिवाली की पूजा किस दिशा में करनी चाहिए?
वास्तु शास्त्र के अनुसार, दीपावली पर पूजा के लिए उत्तर दिशा को शुभ माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि उत्तर दिशा धन और कुबेर देव से संबंधित है। यदि किसी कारणवश इस दिशा में पूजा करना संभव न हो, तो दक्षिण दिशा को छोड़कर घर की किसी अन्य सुविधाजनक दिशा में भी पूजा स्थल बनाया जा सकता है। पूजा करते समय स्वच्छता, श्रद्धा और एकाग्रता का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
दिवाली क्यों मनाई जाती है और इसका धार्मिक महत्व क्या है?
दिवाली से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध धार्मिक मान्यता भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटने से संबंधित है। पौराणिक कथा के अनुसार, 14 वर्षों का वनवास समाप्त करने और रावण पर विजय प्राप्त करने के बाद प्रभु श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण के साथ अपनी नगरी अयोध्या पहुंचे थे। लंबे समय बाद अपने प्रिय राजा को वापस आया देखकर अयोध्या के लोग खुशी से झूम उठे। उनके स्वागत के लिए नगर के घरों और गलियों में दीप जलाए गए और पूरी अयोध्या रोशनी से जगमगा उठी। मान्यता है कि तभी से इस परंपरा को याद करते हुए हर साल दीपावली का पर्व मनाया जाता है।
लक्ष्मी पूजा- विधि
सबसे पहले दिवाली की शाम को घर के मुख्य द्वार, पूजा स्थल की अच्छी तरह के साफ-सफाई करें फिर इसके फूलों, रंगोली और दीपों से सजाएं। इसके बाद पूजा की चौकी पर लाल या पीले रंग का कपड़ा बिछाकर लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमा को स्थापित करें। फिर सबसे पहले पूजा का संकल्प लें और भगवान गणेश को तिलक लगाकर फूल, फूल, दूर्वा और लड्डू अर्पित करें। इसके बाद माता लक्ष्मी को लाल फूल, कमल, फल, खील, खिलौने, बताशे आदि अर्पित करें। पूजन समाग्री अर्पित करने के बाद घी का दीपक जलाएं और धूप सुगंधित करें। फिर विधि-विधान और मंत्रों के साथ भगवान गणेश और माता लक्ष्मी की पूजा करें। इसके बाद लक्ष्मी और गणेश की आरती करें, फिर पूजा में भूल के लिए क्षमा प्रार्थना मांगे।
लक्ष्मी पूजन के लिए पूजन सामग्री
चौकी, लाल या पीला कपड़ा, लक्ष्मी-गणेश की नई मूर्ति, कलश, जल, गंगाजल, आम के पत्ते, नारियल, कलावा, देसी घी का मुख्य दीपक, सरसों या तिल के तेल का दीपक, अक्षत, रोली, हल्दी, चंदन, अबीर, गुलाल, दूर्वा , माला-फूल, खीर, बताशे, मिठाई, खील, कमलगट्टा, फल, सोने-चांदी के सिक्के, रुपए और कौड़ियां।
लक्ष्मी पूजन का शुभ मुहूर्त क्या है?
द्रिक पंचांग के अनुसार, लक्ष्मी पूजन का शुभ मुहूर्त 08 नवंबर को शाम 5 बजकर 54 मिनट से शुरू होकर रात 7 बजकर 50 मिनट तक रहेगा। इस समय स्थिर लग्न वृषभ काल भी मौजूद रहेगा। जिसमें मां लक्षमी की पूजा करना बहुत ही शुभ और फलदायी रहेगा।
लक्ष्मी पूजा मुहूर्त : शाम 05: 54 से 07:50 बजे
प्रदोष काल – शाम 05:31 से 08:09 बजे
वृषभ काल – शाम 05:54 से 07:50 बजे
निशिता काल- रात 11:39 से 12:31
सिंह लग्न – सुबह 12:25 से 02:42
गृहस्थों के लिए दिवाली की रात को प्रदोषकाल और स्थिर लग्न मुहूर्त में महालक्ष्मी पूजन सबसे सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। वहीं निशिथ काल मुहूर्त तांत्रिक पूजा और काली पूजा के लिए सबसे उत्तम माना जाता है।
द्रिक पंचांग के अनुसार, अमावस्या तिथि 08 नवंबर को सुबह करीब 11 बजकर 27 मिनट से शुरू होकर 9 नवंबर को दोपहर करीब 12 बजकर 31 मिनट तक रहेगी। इस दिन प्रदोष काल और अमावस्या तिथि व्याप्त रहेगी।
