भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी मनाई जाती है। महाराष्ट्र में इस पर्व का विशेष महत्व है जहां बड़े-बड़े पंडालों में गणपति की प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। पिछले कुछ दशकों में गणेशोत्सव महाराष्ट्र और दक्षिण तथा पश्चिम भारत से निकलकर उत्तर भारत के कई हिस्सों तक पहुंचा है। अब यह किसी एक क्षेत्र तक सीमित त्योहार नहीं रह गया है। अलग-अलग स्थानों पर गणपति के स्वरूप और उनसे जुड़ी धार्मिक मान्यताएं भी अपने स्थानीय इतिहास और परंपराओं के अनुसार विकसित हुई हैं।
दक्षिण भारत की कई धार्मिक परंपराओं में भगवान गणेश को अविवाहित और ब्रह्मचारी माना जाता है। यहां उनका ब्रह्मचर्य संयम ज्ञान और आध्यात्मिक शक्ति से जोड़ा जाता है। इससे जुड़ी लोककथाओं में कहा जाता है कि गणेश अपनी माता पार्वती को आदर्श स्त्री मानते थे और उनके समान गुणों वाली स्त्री मिलने पर ही विवाह करना चाहते थे। एक अन्य कथा में यह विचार मिलता है कि संसार की सभी स्त्रियां आदिशक्ति और माता पार्वती का ही अंश हैं इसलिए गणेश ने विवाह न करने का निर्णय लिया। तमिलनाडु के सुचिंद्रम में गणेश के स्त्री रूप विनायकी की प्राचीन प्रतिमा भी इस परंपरा की विशिष्टता को दर्शाती है।
वहीं उत्तर भारत में गणपति की छवि काफी अलग दिखाई देती है। यहां उन्हें रिद्धि-सिद्धि दाता और सिद्धि-बुद्धि के पति के रूप में पूजा जाता है। कई चित्रों और प्रतिमाओं में गणेशजी के साथ दो स्त्री आकृतियां दिखाई देती हैं। शिव पुराण से जुड़ी कथा में प्रजापति विश्वरूप की पुत्रियों सिद्धि और बुद्धि का विवाह गणेशजी से बताया गया है। इसी परंपरा से क्षेम और लाभ जैसे पुत्रों का उल्लेख मिलता है जो बाद में लोकप्रिय मान्यताओं में शुभ-लाभ के रूप में अधिक प्रसिद्ध हुए।
इन मान्यताओं का प्रतीकात्मक अर्थ भी काफी महत्वपूर्ण है। बुद्धि विवेक और ज्ञान का प्रतीक है जबकि सिद्धि सफलता या आध्यात्मिक उपलब्धि का संकेत देती है। रिद्धि समृद्धि का प्रतीक मानी जाती है। यानी गणपति के साथ इन शक्तियों का जुड़ाव यह संदेश देता है कि जहां विवेक और बुद्धि है वहां सफलता और समृद्धि का मार्ग भी खुलता है।
महाराष्ट्र में गणपति लोकजीवन का अहम हिस्सा हैं। अष्टविनायक की परंपरा से लेकर सार्वजनिक गणेशोत्सव तक यहां गणपति के अनेक स्वरूप देखने को मिलते हैं। वहीं बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान गणेशजी के पास साड़ी में लिपटा केले का पौधा दिखाई देता है जिसे कोला बऊ कहा जाता है। लोकमान्यता में इसे गणेश की पत्नी माना जाता है लेकिन धार्मिक परंपरा में कोला बऊ वास्तव में नवपत्रिका पूजा का हिस्सा है।
तांत्रिक और शाक्त परंपराओं में भी गणपति के अलग स्वरूप मिलते हैं। उच्छिष्ट गणपति महागणपति ऊर्ध्व गणपति पिंगल गणपति और लक्ष्मी गणपति जैसे रूपों में वे शक्ति के साथ दिखाई देते हैं। इन स्वरूपों को सामान्य वैवाहिक अर्थ में नहीं बल्कि शक्ति और सृजनात्मक ऊर्जा के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
इस तरह भगवान गणेश के अलग-अलग रूप और उनसे जुड़ी मान्यताएं एक-दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि भारतीय धार्मिक परंपराओं की विविधता को दर्शाती हैं। क्षेत्र बदलने के साथ पूजा की शैली और मान्यता बदल सकती है लेकिन गणपति का मूल भाव वही रहता है। वे बुद्धि विवेक और विघ्नों को दूर करने वाली शक्ति के देवता हैं। यही कारण है कि किसी भी शुभ कार्य से पहले गणेशजी का स्मरण करने की परंपरा आज भी पूरे देश में कायम है।
