शक्तिपीठ की महिमा हो, अमर योद्धा आल्हा की भक्ति हो या फिर संगीत की दुनिया का मैहर घरानायह जगह हर किसी को अपनी ओर खींचती है।
माई का हार से कैसे बना मैहर?
मैहर नाम के पीछे भगवान शिव और माता सती से जुड़ी एक पौराणिक कथा है। माना जाता है कि जब सती के वियोग में शिवजी तांडव कर रहे थे, तब भगवान विष्णु ने अपने चक्र से सती के शरीर के टुकड़े किए थे।
उसी समय माता सती का हार यहां त्रिकूट पर्वत पर गिरा था। हार गिरने की वजह से इस जगह को पहले ‘माई का हार’ कहा गया। धीरे-धीरे समय बीतने के साथ यही नाम बदलकर ‘मैहर’ हो गया। आज यह धाम देश के 52 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है।
1063 सीढ़ियों पर बसा 1500 साल पुराना मंदिर
पर्वत की चोटी पर स्थित यह मंदिर करीब 1500 साल पुराना बताया जाता है। इतिहासकार भी प्राचीन शिलालेखों के आधार पर इसकी प्राचीनता को मानते हैं।
मंदिर तक जाने के लिए श्रद्धालुओं को 1063 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं।
हालांकि अब यहां रोपवे की सुविधा भी उपलब्ध है, जिससे बुजुर्ग और बीमार लोग आसानी से ऊपर पहुंच सकते हैं।
9वीं शताब्दी में आदिगुरु शंकराचार्य ने यहां पहली बार विधिवत पूजा की थी। तांत्रिक साधना करने वालों के लिए भी यह जगह बेहद खास है।
आज भी आल्हा करते हैं पहली पूजा
मैहर की सबसे हैरान करने वाली बात अमर योद्धा आल्हा से जुड़ी है। स्थानीय लोगों और पुजारियों का कहना है कि आज भी आल्हा सबसे पहले मां शारदा की पूजा करते हैं।
रोज सुबह जब मंदिर के दरवाजे खुलते हैं, तो माता के चरणों में ताजे फूल और चंदन चढ़ा हुआ मिलता है। हालांकि इसका कोई वैज्ञानिक या लिखित सबूत नहीं है, लेकिन यहां आने वाले भक्तों की इस चमत्कार में अटूट श्रद्धा है। उनका मानना है कि आल्हा आज भी अदृश्य रूप में यहां आते हैं।
संगीत की दुनिया में मैहर का नाम
धार्मिक पहचान के अलावा मैहर को संगीत की नगरी भी कहा जाता है। मशहूर सरोद वादक उस्ताद अलाउद्दीन खां ने इसी शहर में ‘मैहर संगीत घराने’ की नींव रखी थी। उन्होंने और उनके शिष्यों ने भारतीय शास्त्रीय संगीत को दुनिया भर में फैलाया। इसलिए संगीत प्रेमियों के लिए मैहर किसी तीर्थ से कम नहीं है।
