प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश सुभाष सोलंकी ने मां वीणापाणी का पूजन कर किया दीप प्रज्ज्वलन, न्यायालयों के साथ विद्युत और नगरपालिका के प्रि-लिटिगेशन प्रकरण भी होंगे निराकृत

(डॉ.एल.एन.वैष्णव)
दमोह, 12 सितंबर 2026। देशभर के साथ शनिवार को दमोह जिला मुख्यालय सहित तहसील न्यायालय हटा, पथरिया एवं तेंदूखेड़ा में नेशनल लोक अदालत का आयोजन किया गया। जिला मुख्यालय स्थित न्यायालय परिसर में नेशनल लोक अदालत का विधिवत शुभारंभ प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश तथा जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के अध्यक्ष सुभाष सोलंकी ने मां वीणापाणी का पूजन-अर्चन एवं दीप प्रज्ज्वलित कर किया।
इस अवसर पर विशेष न्यायाधीश एवं नेशनल लोक अदालत के प्रभारी अधिकारी उदय सिंह मरावी, जिला न्यायाधीश संतोष कुमार गुप्ता, पंकज कुमार गुप्ता, विश्वनाथ शर्मा, अमर गोयल, धर्मेश भट्ट, पंकज शर्मा, अनुराग सिंह कुशवाहा, स्नेहा सिंह, आज्ञा अग्रवाल, पलक सिंघई दिवाकर, उत्कर्ष दिवाकर, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की सचिव उषाकांता कृषाण, जिला विधिक सहायता अधिकारी रजनीश चौरसिया तथा जिला अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष मुकेश पाण्डे सहित न्यायिक अधिकारी एवं अधिवक्तागण मौजूद रहे।
नेशनल लोक अदालत का आयोजन राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण, नई दिल्ली तथा मध्यप्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, जबलपुर के निर्देशानुसार किया जा रहा है। इसका उद्देश्य न्यायालयों में लंबित ऐसे प्रकरणों का आपसी सहमति और समझौते के माध्यम से निराकरण करना है, जिनमें राजीनामा संभव है। इसके साथ ही विद्युत चोरी से संबंधित प्रकरणों तथा नगरपालिका के जलकर एवं संपत्ति कर से जुड़े प्रि-लिटिगेशन मामलों को भी पक्षकारों की सहमति के आधार पर निपटाने का प्रयास किया जा रहा है।
लोक अदालत का प्रचार-प्रसार
नेशनल लोक अदालत की जानकारी अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने के लिए जिला विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा व्यापक प्रचार-प्रसार किया गया। न्यायालय परिसर से वाहनों के माध्यम से बैनर एवं जिंगल के जरिए शहर के प्रमुख स्थानों पर लोगों को लोक अदालत की उपयोगिता और इसमें मिलने वाले अवसरों की जानकारी दी गई।अस्पताल चौराहा, घंटाघर, बस स्टैंड, तीन गुल्ली, सागर नाका, स्टेशन चौराहा एवं रेलवे स्टेशन सहित भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों में प्रचार किया गया। इसके अलावा नगरपालिका और विद्युत विभाग द्वारा संबंधित प्रकरणों में उपलब्ध छूट की जानकारी देने के लिए सार्वजनिक स्थानों पर होर्डिंग भी लगाए गए हैं।
लोक अदालत को उत्सव के रूप में मनाने की अपील
प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश सुभाष सोलंकी ने न्यायाधीशों और अधिवक्ता संघ से अपील की कि नेशनल लोक अदालत को केवल न्यायिक प्रक्रिया न मानकर जनहित के एक महत्वपूर्ण अवसर के रूप में लिया जाए। उन्होंने कहा कि आपसी सहमति से विवादों का समाधान होने से पक्षकारों को लंबे समय तक चलने वाली मुकदमेबाजी से राहत मिलती है और विवाद का स्थायी समाधान संभव होता है।
उन्होंने अधिवक्ताओं एवं न्यायिक अधिकारियों से अधिक से अधिक राजीनामा योग्य प्रकरणों के निराकरण में सहयोग करने का आह्वान किया, ताकि लोक अदालत का लाभ अधिक से अधिक पक्षकारों तक पहुंच सके।जिला अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष मुकेश पाण्डे ने भी नेशनल लोक अदालत के सफल आयोजन के लिए अधिवक्ताओं की ओर से सकारात्मक एवं पूर्ण सहयोग प्रदान करने का आश्वासन दिया।
नेशनल लोक अदालत का इतिहास: अदालत से समझौते की राह तक
भारत में लोक अदालत की अवधारणा का मूल उद्देश्य यह रहा है कि न्याय केवल अदालत के फैसले तक सीमित न रहे, बल्कि विवादों का समाधान आपसी सहमति, समझौते और सुलह के माध्यम से भी हो। देश में कानूनी सहायता और लोक अदालत आंदोलन को संस्थागत रूप देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम 1980 में राष्ट्रीय स्तर पर कानूनी सहायता कार्यक्रमों की निगरानी के लिए समिति के गठन के साथ उठाए गए। इसके बाद संसद ने विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 बनाया, जिसने लोक अदालतों को वैधानिक आधार प्रदान किया। यह कानून 9 नवंबर 1995 को प्रभावी हुआ और इसी व्यवस्था के तहत राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण यानी NALSA का गठन हुआ।
वर्तमान व्यवस्था में लोक अदालत न्यायालयों में लंबित तथा न्यायालय में जाने से पहले के मामलों को आपसी समझौते से निपटाने का महत्वपूर्ण माध्यम है। लोक अदालत द्वारा किया गया समझौता/अवार्ड सिविल न्यायालय की डिक्री के समान माना जाता है और पक्षकारों पर बाध्यकारी होता है। लंबित मामले के लोक अदालत में समझौते से निपटने पर संबंधित न्यायालय शुल्क की वापसी का भी प्रावधान है।
राष्ट्रीय लोक अदालत की खासियत यह है कि देशभर में एक ही दिन विभिन्न स्तरों की अदालतों में लोक अदालतें आयोजित की जाती हैं। NALSA के अनुसार फरवरी 2015 से राष्ट्रीय लोक अदालतों को विशेष विषयों के आधार पर नियमित रूप से आयोजित करने की व्यवस्था भी की गई है।इस प्रकार लोक अदालत भारतीय न्याय व्यवस्था में केवल मुकदमों की संख्या कम करने का माध्यम नहीं, बल्कि पक्षकारों के बीच विवाद को संवाद और सहमति से समाप्त करने की ऐसी व्यवस्था है, जिसमें समय, धन और मानसिक तनाव को कम करने का प्रयास किया जाता है।
