पेट्रोल पंप की लीज समाप्त करने के ट्रस्ट के फैसले के बीच नया विवाद; क्या ग्राम पंचायत के पत्र में निजी हित और मंदिर की भूमि की वास्तविक स्थिति स्पष्ट थी?
डॉ.एल.एन.वैष्णव
दमोह। बांदकपुर के जागेश्वरनाथ धाम में प्रस्तावित कॉरिडोर को लेकर एक नया विवाद सामने आया है। पेट्रोल पंप की लीज से संबंधित मंत्री धर्मेंद्र सिंह लोधी के पत्र की चर्चा सोशल मीडिया पर शुरू होने के बाद मंदिर कॉरिडोर के लिए लंबे समय से आवाज उठाने वाले श्रद्धालुओं और समर्थकों की ओर से आपत्ति दर्ज कराए जाने की बात सामने आई है। कुछ लोगों के मंदिर ट्रस्ट कमेटी के समक्ष व्यक्तिगत रूप से पहुंचने और सोशल मीडिया के माध्यम से अपना पक्ष रखने की जानकारी भी सामने आई है।मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए सवाल किसी व्यक्ति पर आरोप लगाने का नहीं, बल्कि पत्राचार में रखे गए तथ्यों और मंदिर ट्रस्ट के वास्तविक निर्णय के बीच स्थिति स्पष्ट करने का है।
ट्रस्ट ने लीज बढ़ाने से किया इनकार, फिर विवाद क्यों?
उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार मंदिर ट्रस्ट की खसरा नंबर 16/1 की करीब 19,250 वर्गफीट भूमि वर्ष 2006 में 20 वर्ष की लीज पर पेट्रोल पंप के लिए दी गई थी। यह लीज 30 सितंबर 2026 को समाप्त हो रही है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि लीज बढ़ाने का आवेदन निरस्त कर दिया गया है और ट्रस्ट ने भूमि खाली करने की प्रक्रिया शुरू की है। इसी भूमि की आवश्यकता ‘जागेश्वरनाथ लोक’ कॉरिडोर विकास के लिए बताए जाने की जानकारी भी सामने आई है।
यहीं से सबसे महत्वपूर्ण सवाल खड़ा होता है—
जब मंदिर ट्रस्ट स्वयं लीज आगे नहीं बढ़ाने का निर्णय ले चुका था, तो पेट्रोल पंप को लेकर मंत्री स्तर पर पत्राचार में वास्तविक स्थिति क्या बताई गई थी?

क्या ग्राम पंचायत के पत्र में निजी हित का उल्लेख था?
इस मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू ग्राम पंचायत से जुड़े पत्राचार का है। यदि ग्राम पंचायत की ओर से पेट्रोल पंप के समर्थन में कोई पत्र भेजा गया है और पेट्रोल पंप का संचालन ग्राम पंचायत के सरपंच से जुड़े निजी व्यावसायिक हित से संबंधित है, तो यह सार्वजनिक रूप से स्पष्ट होना चाहिए कि पत्र में इस तथ्य का उल्लेख किया गया था या नहीं।
यहां आरोप तय करने के बजाय दस्तावेजों से जवाब तलाशना जरूरी है—
क्या पंचायत का पत्र वास्तव में ग्रामीणों की सामूहिक आवश्यकता के आधार पर था?क्या उसमें पेट्रोल पंप की लीज समाप्त होने की वास्तविक स्थिति बताई गई थी?क्या मंदिर ट्रस्ट द्वारा लीज आगे नहीं बढ़ाने के निर्णय की जानकारी दी गई थी?और क्या पत्र में किसी संभावित निजी हित या हित-संघर्ष को स्पष्ट किया गया था?
इन सवालों का उत्तर संबंधित पत्र और रिकॉर्ड के सार्वजनिक होने के बाद ही निश्चित रूप से दिया जा सकता है।
मंत्री को गुमराह किया गया या जानकारी अधूरी पहुंची?
बांदकपुर कॉरिडोर स्वयं राज्य सरकार की घोषित विकास परियोजना का हिस्सा है। अप्रैल 2025 में करीब 100 करोड़ रुपये की लागत से कॉरिडोर निर्माण और प्रथम चरण के कार्य की जानकारी सार्वजनिक की गई थी। दिसंबर 2025 में निर्माण की गति को लेकर मंत्री धर्मेंद्र सिंह लोधी द्वारा अधिकारियों को समयसीमा में काम कराने के निर्देश दिए जाने की भी रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी।
ऐसे में वर्तमान विवाद का मूल प्रश्न यह है कि कॉरिडोर और पेट्रोल पंप की भूमि से जुड़े सभी तथ्य मंत्री के सामने किस रूप में रखे गए?यदि सभी तथ्य पहले से उपलब्ध थे, तो विवाद की स्थिति क्यों बनी?
और यदि कुछ महत्वपूर्ण तथ्य पत्राचार में शामिल नहीं थे, तो यह पता लगाना आवश्यक है कि वे तथ्य किस स्तर पर छूटे।
पत्र वायरल होने के बाद सफाई की जरूरत क्यों पड़ी?
मंत्री से संबंधित पत्र सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद उनके समर्थकों की ओर से स्पष्टीकरण दिए जाने की चर्चा भी हो रही है। सोशल मीडिया पर चल रही प्रतिक्रियाओं की स्वतंत्र पुष्टि अलग-अलग स्तर पर आवश्यक है, इसलिए इसे अंतिम तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
लेकिन यदि वास्तव में सफाई जारी करनी पड़ी है तो सार्वजनिक हित में यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि मूल पत्र में क्या कहा गया था, किसके आग्रह पर कहा गया था और बाद में कौन-सा तथ्य सामने आया जिसके कारण स्थिति स्पष्ट करने की आवश्यकता महसूस हुई।
मंत्री स्वयं बांदकपुर कॉरिडोर को लेकर सक्रिय रहे हैं
राज्यमंत्री धर्मेंद्र सिंह लोधी के आधिकारिक परिचय में संस्कृति, पर्यटन तथा धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व विभाग का स्वतंत्र प्रभार दर्ज है। बांदकपुर से उनका जुड़ाव भी सार्वजनिक कार्यक्रमों और कॉरिडोर संबंधी गतिविधियों में सामने आता रहा है। अगस्त 2026 में उनके नेतृत्व में कांवड़ यात्रा का समापन बांदकपुर में होने की रिपोर्ट भी प्रकाशित हुई थी।
इसलिए मौजूदा विवाद में सवाल मंत्री की धार्मिक या विकास संबंधी प्रतिबद्धता पर नहीं, बल्कि उन तक पहुंचाई गई जानकारी की पूर्णता और तथ्यात्मकता पर होना चाहिए।
अब सार्वजनिक होना चाहिए पूरा दस्तावेजी सच
बांदकपुर का मामला धार्मिक आस्था, मंदिर ट्रस्ट की संपत्ति और करोड़ों रुपये की विकास परियोजना से जुड़ा है। ऐसे में किसी व्यक्ति या संस्था पर सीधे आरोप लगाने के बजाय चार दस्तावेज सामने आना सबसे महत्वपूर्ण होगा—
- मंदिर ट्रस्ट और पेट्रोल पंप के बीच मूल लीज दस्तावेज।
- लीज आगे नहीं बढ़ाने संबंधी ट्रस्ट कमेटी का निर्णय।
- ग्राम पंचायत द्वारा भेजा गया मूल पत्र और उसके आधार में लगाए गए दस्तावेज।
- मंत्री कार्यालय को भेजे गए पत्र तथा उस पर हुई कार्रवाई/प्रतिक्रिया।
इन दस्तावेजों से काफी हद तक यह स्पष्ट हो सकता है कि मंत्री को पूरी जानकारी दी गई थी, जानकारी अधूरी थी या अलग तरीके से प्रस्तुत की गई थी।
सबसे बड़ा सवाल
क्या बांदकपुर के जागेश्वरनाथ कॉरिडोर जैसी सार्वजनिक और धार्मिक महत्व की परियोजना से जुड़े निर्णयों में किसी निजी व्यावसायिक हित की छाया पड़ रही है?यदि नहीं, तो संबंधित पक्ष दस्तावेजों के साथ स्थिति स्पष्ट करें। और यदि पत्राचार में कोई तथ्य छूटा है, तो वह भी सामने आना चाहिए।क्योंकि सवाल किसी व्यक्ति की छवि का नहीं, मंदिर ट्रस्ट की भूमि, सार्वजनिक धन से बनने वाले कॉरिडोर और श्रद्धालुओं के हित से जुड़े निर्णयों की पारदर्शिता का है।
