(डॉ.एल.एन. वैष्णव )
दमोह। नवागत कलेक्टर प्रताप नारायण यादव ने आते ही फिल्टर प्लांट का निरीक्षण किया, अफसरों को फटकार लगाई, आपात बैठक ली, सख्त निर्देश दिए और साफ शब्दों में चेतावनी भी दे दी कि पेयजल व्यवस्था में लापरवाही बर्दाश्त नहीं होगी।लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल बैठकों, निरीक्षणों और चेतावनियों से दमोह की प्यास बुझ जाएगी?
क्योंकि दमोह की जमीन पर जो तस्वीर दिखाई दे रही है वह बेहद डरावनी है—
शहर के नल सूखे हैं, टंकियां अधभरी हैं, वार्डों में हाहाकार है, महिलाएं पानी के बर्तनों के साथ भटक रही हैं, और जिम्मेदार सिस्टम के चेहरे पर अजीब किस्म की निर्विकार शांति पसरी हुई है।
यानी ऊपर कलेक्ट्रेट में सख्ती का माहौल है और नीचे नगर पालिका के तंत्र में जैसे सब कुछ सामान्य हो।
यहीं से शुरू होता है सबसे बड़ा संदेह।
क्या दमोह में पेयजल संकट प्राकृतिक है… या पैदा किया गया संकट?
यह सवाल अब केवल जनता ही नहीं, प्रशासनिक गलियारों में भी दबे स्वर में पूछा जा रहा है।
क्योंकि यह मान लेना मुश्किल है कि करोड़ों रुपये की योजनाओं, पाइपलाइन विस्तार, फिल्टर प्लांट उन्नयन और जल वितरण सुधार के तमाम दावों के बाद अचानक पूरा सिस्टम यूं ही घुटनों पर आ गया।
सच यह है कि दमोह का जल संकट आसमान से नहीं टपका।
यह वर्षों की सुनियोजित ढिलाई, तकनीकी लापरवाही, निगरानीहीनता और जवाबदेही शून्यता का तैयार किया हुआ परिणाम है।
- टंकियां समय पर नहीं भर रहीं,
- सप्लाई का प्रेशर गायब है,
- अंतिम वार्डों तक पानी नहीं पहुंच रहा,
- बिजली कटौती बहाना बन रही है,
- और टैंकर संस्कृति फिर दस्तक दे रही है।
यह सब अचानक नहीं होता।
यह तब होता है जब व्यवस्था को संभालने वाले लोग समस्या को समस्या नहीं, प्रक्रिया मानने लगते हैं।
करोड़ों की योजनाएं किसके लिए थीं—जनता के लिए या कागजों के लिए?
दमोह शहर में पेयजल व्यवस्था सुधारने के नाम पर पिछले वर्षों में करोड़ों रुपये बहाए गए।
पाइपलाइनें बिछीं, सड़कों की खुदाई हुई, मरम्मत हुई, फिल्टर प्लांट की बातें हुईं, वितरण नेटवर्क के उन्नयन का शोर मचा—लेकिन आज नतीजा क्या है?
15 से अधिक वार्ड पानी के लिए तरस रहे हैं।
तो सीधा प्रश्न है—
क्या योजनाएं गलत थीं?
क्या काम घटिया हुआ?
क्या निगरानी फेल रही?
या फिर सब कुछ जानते हुए आंखें मूंदी गईं?
और सबसे महत्वपूर्ण—
यदि यह सब विफल रहा तो आज तक किसी एक जिम्मेदार इंजीनियर, अधिकारी, ठेकेदार या पर्यवेक्षक पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
दमोह की जनता मूर्ख नहीं है।
उसे समझ आ रहा है कि जहां करोड़ों खर्च हों, परिणाम शून्य हो और फिर भी किसी की जवाबदेही तय न हो—वहां केवल लापरवाही नहीं होती, वहां सिस्टम की मिलीभगत की बू आती है।
कलेक्टर ने फटकारा… मगर क्या नीचे के चेहरों पर डर दिखा?
यह सबसे चिंताजनक दृश्य था।
कलेक्टर ने आपात बैठक बुलाई। जल संकट पर कड़े निर्देश दिए। संबंधित अमले को चेताया।
लेकिन बैठक खत्म होते ही कलेक्ट्रेट परिसर में नगर पालिका के कुछ जिम्मेदार चेहरे जिस सहजता, जिस हल्केपन और जिस बेफिक्री से घूमते दिखाई दिए, उसने पूरा संदेश बदल दिया।
यदि शहर प्यासा हो और जिम्मेदार चेहरे तनावमुक्त हों, तो इसका अर्थ साफ है—
या तो उन्हें अपनी जवाबदेही का एहसास नहीं,
या उन्हें भरोसा है कि हर बार की तरह इस बार भी कुछ नहीं होगा।
यही दमोह की सबसे बड़ी बीमारी है।
यहां संकट से ज्यादा मजबूत है—
“कुछ नहीं होगा” वाली मानसिकता।
हर गर्मी में प्यास क्यों? क्योंकि हर गर्मी में अवसर छिपा है
दमोह में जल संकट अब मौसमी प्रशासनिक शब्द नहीं रहा, यह एक पैटर्न बन चुका है।
पहले गर्मी बढ़ती है।
फिर सप्लाई लड़खड़ाती है।
फिर जनता परेशान होती है।
फिर आपात बैठकें होती हैं।
फिर टैंकरों की चर्चा होती है।
फिर अस्थायी मरम्मत, वैकल्पिक इंतजाम, विशेष प्रबंधन के नाम पर फाइलें खुलती हैं।
और हर साल जनता को यही बताया जाता है—“व्यवस्था सुधार रहे हैं।”
प्रश्न यह है कि यदि व्यवस्था हर साल सुधार ही रहे हैं तो बिगाड़ कौन रहा है?
या फिर सच यह है कि बिगड़ी व्यवस्था कुछ लोगों के लिए हर साल नई कमाई का रास्ता बनती है?
यह सवाल अब सड़क से उठकर दफ्तरों की दीवारों तक पहुंच चुका है।
प्रताप नारायण यादव के सामने असली परीक्षा: पानी भेजना नहीं, सिस्टम तोड़ना
नवागत कलेक्टर के सामने चुनौती सिर्फ इतनी नहीं है कि वार्डों में पानी पहुंच जाए।
टैंकर भेजकर, मोटर चलवाकर, सप्लाई घंटे बढ़वाकर यह गर्मी किसी तरह निकाली जा सकती है।
लेकिन दमोह को केवल इस गर्मी की राहत नहीं चाहिए।
दमोह जानना चाहता है—
- किसकी लापरवाही से यह हालत बनी?
- करोड़ों खर्च के बाद भी नल सूखे क्यों हैं?
- किसने गलत रिपोर्ट दी?
- किसने काम की गुणवत्ता जांची?
- किसने आंखें मूंदी?
- और किसके संरक्षण में हर बार जिम्मेदार बच निकलते हैं?
यदि कलेक्टर प्रताप नारायण यादव केवल दैनिक समीक्षा तक सीमित रहते हैं, तो वे भी पूर्व की फाइलों का हिस्सा बन जाएंगे।
लेकिन यदि वे इस पूरे पेयजल तंत्र की परतें खोलते हैं, नाम तय करते हैं, कार्रवाई करते हैं और जवाबदेही स्थापित करते हैं—तभी यह संदेश जाएगा कि दमोह में इस बार सचमुच प्रशासन आया है।
दमोह की जनता अब पानी से ज्यादा कार्रवाई देखना चाहती है
क्योंकि पानी की समस्या तो हर घर में है,
लेकिन जनता के भीतर जो आक्रोश है वह अब सिर्फ प्यास का नहीं—धोखे का आक्रोश है।
उसे बताया गया था कि योजनाएं बन रही हैं।
उसे भरोसा दिलाया गया था कि संकट खत्म होगा।
उसे हर साल आश्वासन मिला।
और आज फिर वही सूखे नल उसके सामने खड़े हैं।
इसलिए दमोह आज केवल यह नहीं पूछ रहा कि पानी कब आएगा—
वह यह पूछ रहा है कि जिम्मेदारों पर गाज कब गिरेगी?
क्योंकि फिलहाल सच यही है—
कलेक्ट्रेट में आदेश हैं, नगर पालिका में बहाने हैं, और शहर में प्यास है।
