धार जिले के राजगढ़ में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का काफिला गुजर रहा था, तभी सड़क किनारे भुट्टा बेच रहे एक दिव्यांग युवक ने उन्हें आवाज लगाई। मुख्यमंत्री ने काफिला रुकवाया, युवक से भुट्टा खरीदा, बातचीत की और उसे 500 रुपए भी दिए। बातचीत के दौरान युवक ने बताया कि उसने मास्टर ऑफ सोशल वर्क की पढ़ाई की है, लेकिन नौकरी नहीं मिलने के कारण उसे भुट्टा बेचने और चाय-पकौड़े की दुकान चलाकर परिवार का पालन-पोषण करना पड़ रहा है। युवक की यह बात सामने आने के बाद बेरोजगारी को लेकर नई बहस शुरू हो गई। कई लोगों ने इसे पढ़े-लिखे युवाओं की मौजूदा स्थिति का उदाहरण बताया, जबकि राजनीतिक हलकों में भी इस घटना की चर्चा होती रही।
उधर राजगढ़ जिले के नरसिंहगढ़ में एक सरकारी कार्यक्रम के दौरान बड़ा विवाद हो गया। प्रभारी मंत्री चैतन्य काश्यप की मौजूदगी में जिला पंचायत अध्यक्ष और कांग्रेस नेता चंदर सिंह सोंधिया को पहले कार्यक्रम में प्रवेश से रोका गया। बाद में अधिकारियों के हस्तक्षेप के बाद उन्हें अंदर जाने दिया गया, लेकिन इस घटनाक्रम से नाराज होकर उन्होंने मंच के सामने बैठकर विरोध जताया। बाद में जब वह कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे, तभी एक व्यक्ति ने उन्हें थप्पड़ मार दिया। घटना के बाद पुलिस उन्हें थाने ले गई, जबकि कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने थाने का घेराव कर विरोध प्रदर्शन किया। इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो भी सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ।
इसी बीच दतिया उपचुनाव में टिकट नहीं मिलने के बाद सार्वजनिक मंच पर भावुक हुए पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा को लेकर भाजपा के भीतर भी अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आईं। भाजपा विधायक पन्नालाल शाक्य ने कहा कि वर्ष 2018 में उनका भी टिकट कटा था और तब उनकी आंखों में भी आंसू आए थे, लेकिन किसी ने उनकी चिंता नहीं की। उन्होंने पार्टी के फैसले को उचित बताते हुए कहा कि नए लोगों को अवसर देने के लिए कभी-कभी पुराने नेताओं को पीछे हटना पड़ता है।
वहीं भाजपा के वरिष्ठ विधायक गोपाल भार्गव ने अलग राय रखते हुए कहा कि राजनीति में सक्रिय व्यक्ति का भविष्य कभी समाप्त नहीं होता। उन्होंने संकेत दिया कि नरोत्तम मिश्रा की राजनीतिक भूमिका आगे भी महत्वपूर्ण रह सकती है। इन बयानों के बाद यह चर्चा तेज हो गई कि भाजपा में नेतृत्व परिवर्तन और भविष्य की रणनीति को लेकर अलग-अलग सोच मौजूद है।
इधर प्रशासनिक गलियारों में भी नई चर्चाओं ने जोर पकड़ा। नए मुख्य सचिव की नियुक्ति के बाद वरिष्ठ अधिकारियों की जिम्मेदारियों में बदलाव को लेकर मंत्रालय में हलचल बनी रही। आदेश जारी होने से पहले ही एक वरिष्ठ अधिकारी द्वारा मंत्रालय छोड़ने की तैयारी और बाद में उनकी नई पदस्थापना को लेकर भी चर्चाओं का बाजार गर्म रहा।
इन तीनों घटनाओं ने एक बार फिर यह दिखाया कि मध्य प्रदेश की राजनीति में जमीनी मुद्दों, राजनीतिक टकराव और सत्ता के भीतर की हलचल लगातार सुर्खियां बटोर रही हैं।
